रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 279, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंविलासाः' । एवमेव च य-व-लोपप्रयुक्तम्—'अपर इषव एते कामिनीनां
दृगन्ताः'।
कथं तर्हि—
भुजगाहितप्रकृतयो गारुडमन्त्रा इवावनीरमण ।
तारा इव तुरगा इव सुखलीना मन्त्रिणो भवतः ॥
सन्ध्वकरणम् । अत्र च 'लोपः शाकल्यस्य' इति य-व-लोपानुशासनस्य त्रिपादीस्थत्वेन
सपादसप्ताध्यायीस्थगुणादिविधिं प्रत्यसिद्धत्वाद् भवति सन्ध्वकरणम् । असकृदेवं सत्य-
श्रव्यत्वम् । सकृत्त्वनुशास नानुष्ठानाद्यर्थत्वान्न तथा । अपर इषव इत्यत्रायादेशघटकस्य
इषव एते इत्यत्र च यादेशस्य पूर्वोक्तेन सूत्रेण विकल्पेन लोपः कृतः ।
भुजगेत्यादि । हे अवनीरमण ? भवतो मन्त्रिणः भुजगानां सर्पाणामहिता
प्रकृतिर्येषां ते भुजगाऽहितप्रकृतयो गरुडसम्बन्धिमन्त्रा इव भुजगानां विटानामहिता
जैसे —'अपर इषव एते कामिनीनां दृगन्ताः' ( कामिनियों के ये कटाक्ष दूसरे
बाण हीं तो हैं ) । इस पद्यांश में 'अपरे + इषवः' इस स्थिति में 'रे' के एकार के
स्थान में 'एचोऽयवायावः' ( पा० सू० ६।१।७८) द्वारा विहित अय्-आदेश के अवयव
'य्' का और 'इषवः + एते' इस स्थिति में विसर्गादेश के असिद्ध हो जाने से प्राप्त
रेफ के स्थान में 'भो-भगो-अघो...योऽशि' (पा० सू० ८।३।१७) सूत्र द्वारा विहित
'य्' का पूर्वोक्त सूत्र से लोप किये जाने से अश्रव्यता आ गई है। अब प्रश्न यह है
कि यदि उपर्युक्त य्, व् के लोप से वाक्य मे अश्रव्यता आ जाती है तो फिर
पण्डितराज ने स्वयं हीं—'भुजगाहितप्रकृतयो गारुडमन्त्रा इवावनीरमण । तारा
इव तुरगा इव सुखलीना मन्त्रिणो भवतः ॥' इस पद्य का निर्माण कैसे किया,
क्योंकि इसमें भी 'मन्त्राय् इव', 'ताराय् इव', 'तुरगाय् इव' के स्थान पर जो
'... मन्त्रा इव', 'तारा इव', 'तुरगा इव' ये पाठ हैं इनमें 'लोपः शाकल्यस्य'
( पा० सू० ८।३।१९) के अनुसार 'य्' का वारम्बार लोप किया गया है । इसके
उत्तर में पण्डितराज ने यह कहा है कि उक्त पद्य में य् के लोप के बिना हीं 'मन्त्रा-
यिव', 'तारायिव', 'तुरगायिव' पाठ होने से अश्रव्यता नहीं है। यह य्-लोपाभाव उक्त
लोप-विधि के वैकल्पिक—शाकल्यमात्र आचार्य के मत में लोप और अन्य आचार्यों
के मत में उसका अभाव—होने से सम्भव है । 'सुखलीनाय् मन्त्रिणो' के स्थान पर
'हलि सर्वेषाम्' ( पा० सू० ८।३।२२ ) सूत्र से नित्य य्-लोप यद्यपि किया गया है
तथापि इसका बाहुल्य—एक से अधिक बार—न होने से इस अंश में अश्रव्यता
नहीं है । पद्यार्थ निम्नलिखित है—
" हे राजन् ! आपके मन्त्री तो भुजंगों—सर्पों के लिए अहितकर स्वभाव वाले
गरुड़-मन्त्रों के समान भुजंगों—धूर्तों के लिए अहितकर स्वभाव वाले, अच्छी तरह