रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४६ रसगङ्गाधरः
त्रपाकुला' ।) इदं चाश्रव्यत्वं काव्यस्य पङ्गुत्वमिव प्रतीयते ।
अथ स्वेच्छया संध्यक्षरणं सकृदप्यश्रव्यम् । यथा--'रम्याणि इन्दुमुखि
ते किलकिञ्चितानि' । प्रगृह्यताप्रयुक्तं त्वसकृदेव--'अहो अमी इन्दुमुखी-
पूर्वोक्तं सर्वमेवाश्रव्यत्वं वक्ष्यमाणं च काव्यांशविशेषे वर्त्तमानं तच्छरीरे वर्त्तमानेन
पङ्गुत्वेन तुल्यं चमत्कारापहारि, ततश्च रसाद्यप्रतीत्यापत्तिरित्याह--इदं चेत्या-
दिना ।
प्रकारान्तरमश्रव्यत्वस्याह--स्वेच्छयेत्यादिना । स्वेच्छया = अनुशासनं विना ।
'णि' 'इन्द्र' इत्यत्रेकारसवर्णदीर्घसन्ध्यभावः स्वेच्छया कृतः । 'चन्द्रमुखि !' इति पाठे
तु नाश्रव्यत्वं स्यात् , असकृदेवेति । एतेन सकृत् प्रगृह्यताप्रयुक्तसन्ध्यभावो
नाश्राव्यत्वापादक इति लभ्यते, अन्यथा काव्ये तदनुशासनानर्थक्यमननुष्ठानलक्षणं
स्यात् । सकृदनुष्ठानेन शास्त्रसार्थक्ये पुनस्तदननुष्ठानं न शास्त्रवैयर्थ्यात्मकमिति
तात्पर्यम् । अहो इत्यत्र 'ओत्' इति सूत्रेण, 'अमो' इत्यत्र च 'अदसो मात्' इति
सूत्रेण प्रगृह्यता । चन्द्रमुखीतिपाठे त्वत्राप्यश्रव्यत्वमपनुद्यते । एवमेव = असकृत्
संयोग दीर्घ-स्वर से अव्यवहितोत्तरवर्त्ती और भिन्नपदगत हो ही नहीं सकता।
अतः परसवर्णनिष्पन्न संयोग कभी भी अश्रव्य नहीं होता । यह काव्यगत अश्रव्यता
प्राणियों में पाई जाने वाली पङ्गुता ( लंगड़ापन ) के समान है जो रस-प्रवाह को
अवरुद्ध कर देती है । अतः वर्जनीय है ।
पूर्वोक्त अश्रव्यता से अतिरिक्त नियमप्राप्त स्वरसन्धि आदि का न करना भी
अश्रव्यताधायक है । जैसे ---'रम्याणि इन्दुमुखि ते किलकिञ्चितानि' ( अरी
चन्द्रमुखी ! तेरे ये भाव, जो मित्रादि की प्राप्ति से उत्पन्न हर्ष के कारण
मुस्कुराहट, शुष्क रोदन और क्रोध आदि से मिश्रित हैं, बड़े ही आकर्षक हैं ) ।
इस पद्यांश में 'णि' के इकार और 'इन्दु' के इकार के स्थान में प्राप्त सवर्णदीर्घ
न करने से अश्रव्यता आ गई है । इसी प्रकार 'प्रगृह्य-संज्ञा' के कारण
'प्रकृतिभाव' हो जाने पर सामान्यतः स्वर-सन्धियां जहाँ नहीं हो पातीं ऐसे
पदों का अनेक बार एक वाक्य में प्रयोग करने पर भी अश्रव्यता आ जाती ।
उदाहरणार्थ--'अहो अमी इन्दुमुखीविलासाः' (चन्द्रमुखी के ये विलास अद्भुत हैं !)
इस पद्यांश में 'अहो' इस निपात के 'ओत्' ( पा० सू० १।१।१५ ) सूत्रानुसार
और 'अमी' पद के 'अदसो मात्' ( पा० सू० १।१।१२ ) सूत्रानुसार प्रगृह्य-संज्ञक
हो जाने से क्रमशः पूर्वरूप और सवर्णदीर्घ सन्धियां नहीं हो पातीं । अतः व्याकरणा-
नुसार इस प्रयोगों में शुद्धता होने पर भी अश्रव्यता है हीं । इसी तरह यदि किसी
काव्य मे अनेक बार 'लोपः शाकल्यस्य' ( पा० सू० ८।३।१९ ) सूत्रानुसार
यकार अथवा वकार का लोप किया गया हो तो भी अश्रव्यता का अनुभव होता ।