रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४४ रसगङ्गाधरः
वर्णस्य पूर्वपदभक्ततया न संयोगो भिन्नपदगतः । प्रत्येकं संयोगसंज्ञेति
पक्षेऽपि भिन्नपदगतः संयोगो न दीर्घादव्यवहितपरः । नवाम्बुदेत्यत्र त्वे-
तानित्यत्र नीडित्यत्र च इति पाठः श्रेयान् । प्रत्येकमित्यादि ।
अयं च पक्षः संयोगसंज्ञासूत्रभाष्योक्तः । एवञ्च परसवर्णनिष्पन्नो हलेकः संयोगः,
यस्मिंश्च परे परसवर्णः सोऽन्यः संयोग इति लभ्यते । तथा च तान्तमाले-
त्यादौ न् इत्येकः, त् इत्यपरः संयोगः । भिन्नपदगतः संयोगः = परपदाद्या-
वयवह्ल्रूपः । न दीर्घादित्यादि । पूर्वपदान्त्यावयवभूतेन परसवर्ण-
निष्पन्नहला संयोगरूपेण व्यवधानादिति भावः । यश्च पूर्वः संयोगः परसवर्णरूपः
स न भिन्नपदगत इत्यपि बोध्यम् । 'तान्तमाल.' इत्यादिपद्यद्वितीयपादघटके
'नवाम्बुद' शब्दे विचारयति-नवाम्बुदेत्यादिना । एकादेशस्य = नव + अम्बुदेत्यत्र
तो पूर्व और उससे अव्यवहितोत्तरवर्त्ती दोनों व्यञ्जनों के समूह की संयोग संज्ञा
होती है-इस पक्ष के अनुसार किया गया । अब पाणिनि के "हलोऽनन्तराः संयोगः"
इस संयोग-संज्ञाविधायक सूत्र के महाभाष्य में निर्दिष्ट पक्षान्तर-'प्रत्येकं संयोग-
संज्ञा', अर्थात् जो दो व्यञ्जन अव्यवहित पूर्वापर हों-जिन दो व्यञ्जनों के मध्य
में कोई स्वर न हो-उनमें से प्रत्येक व्यञ्जन संयोग कहलाता-पूर्व व्यञ्जन भी
एक संयोग है और परवर्त्ती व्यञ्जन भी एक संयोग है-के अनुसार भी विचार
करने पर परसवर्णनिष्पन्न संयोग में श्रुतिकटुता नहीं आती, क्योंकि जो प्रथम संयोग
परसवर्णनिष्पन्न व्यंजन है वह यदि दीर्घ स्वर के बाद आया भी हो तो वह भिन्न-
पदगत नहीं होता और जो द्वितीय संयोग-परवर्त्ती पद का आद्यावयव व्यंजन है
वह पूर्ववर्त्ती पद के दीर्घ-स्वर से नहीं अपितु उसके अन्त्यावयवभूत परसवर्णनिष्पन्न
प्रथमसंयोगस्वरूप व्यंजन से परवर्त्ती है । इस प्रकार स्पष्ट है कि परसवर्णनिष्पन्न
संयोग वहां भी श्रुतिकटु नहीं होता जहां उसका एक व्यंजन पूर्वपद का अन्त्यावयव
हो और दूसरा दूसरे पद का आद्यावयव । जहां एक हीं पद में परसवर्ण है वहां तो
उसके श्रुतिकटु होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता । अब 'तान्तमालतरुकान्ति...'
आदि पद्य के उत्तरार्ध में आये 'नवाम्बुद...' एवं इस प्रकार के अन्य 'म्बु' आदि
शब्दों में जो दीर्घ स्वर के बाद परसवर्ण-निष्पन्न संयोग-श्रूयमाण हैं उनके विषय में
विचार कर लेना चाहिए कि वे श्रुतिकटु (अश्रव्य) होते या नहीं । एकादेश के
विषय में पाणिनि का एक योग है-"अन्तादिवच्च' (६।१।८५) । इसका
अर्थ यही है कि पूर्व-पर स्वरों के स्थान में हुआ एक आदेश, जैसे अ + अ के स्थान
में हुआ सवर्णदीर्घ एकादेश 'आ', साधारणतया पूर्वपद का आद्यावयव भी
माना जाता और परपद का अन्त्यावयव भी । इसके अनुसार नव + अम्बुद इन दो
पदों में पूर्वपद 'नव' के अन्तिम अकार और परपद 'अम्बुद' के आद्य अकार के