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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 275, कुल 414 में से

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पृष्ठ 275

एकपदगतस्य तु तथा नाश्राव्यम् । यथा—'जाग्रता विचितः पन्थाः
शात्रवाणां वृथोद्यमः'। परसवर्णकृतस्य तु संयोगस्य सर्वथा दीर्घाद्भिन्न-
पदगतत्वाभावान्मधुरत्वाच्चानन्तर्यं न मनागप्यश्राव्यम् । यथा—'तान्तमाल-
तरुकान्ति-' इत्यादिपद्ये । अत्र तामित्यत्र नीमित्यत्र च परस-
भिन्नपदगतस्य संयोगस्यानेकवारं प्रयोगेऽधिकमश्राव्यत्वमित्यर्थः ।
तथा = दीर्घानन्तर्यं संयोगस्य सकृदसकृद्वा । यद्वासकृत्संयोगस्य दीर्घानन्तर्य-
मित्यनुवर्त्य तथेत्यस्य सुतरामश्राव्यमित्यर्थः कार्यः । तथा च किञ्चिदश्राव्यत्वं
भवत्येवेति तात्पर्यं कल्पनीयम्, जाग्रतेत्युदाहरणे जा, शा, थो इति त्रयाणां
संयोगपूर्वाणां दीर्घाणामुपलम्भात् । सर्वथेति । अव्यवहितयोर्द्वयोर्हलोः संयोगसंज्ञेति
पक्षे परस्य हलः परपदावयवत्वेन तद्घटितसमुदायरूपस्य संयोगस्य न पूर्णतः पूर्वपद-
घटकत्वं न वा पूर्णत उत्तरपदघटकत्वमित्यभिप्रायेणोक्तं सर्वथेति । दीर्घादित्यस्य
आनन्तर्यमित्यनेनान्वयः । नीमित्यत्रेत्यादि । लङ्गिनीङ्किङ्करीत्येतद्घटकस्येत्यर्थः ।
तब तो अश्राव्यता का आधिक्य हो जाता है। जैसे—'एषा प्रिया मे क्व गता
त्रपाकुला' इस पद्यांश में 'षा' के बाद 'प्रि' और 'ता' के बाद 'त्र' इन संयोगों में
अधिक अश्राव्यता है । किन्तु यदि दीर्घोत्तरवर्त्ती संयोग एक-पदनिष्ठ हो, अर्थात्
जिस पद में दीर्घ स्वर हो उसी पद में दीर्घोत्तरवर्त्ती संयोग भी हो, तो अश्राव्यता
नहीं आती । जैसे—उक्त पद्य में ही 'विलोक्यते' पद में 'लो' में दीर्घ स्वर के बाद
'क्य' में क्-य् का संयोग अश्राव्य नहीं है । इसी प्रकार 'जाग्रता विचितः पन्थाः
शात्रवाणां वृथोद्यमः' (शत्रुओं का सारा प्रयास निरर्थक हो गया, क्योंकि जगे हुए
उसके विरोधी ने उसके गुप्त मार्ग को खोज लिया ) इस पद्यार्ध में 'जा' के बाद
'ग्र' और 'शा' के बाद 'त्र' इन संयोगों में अश्राव्यता नहीं है । यदि दीर्घ-स्वर
के बाद का भिन्न-पदगत संयोग परसवर्ण-सन्धि से निष्पन्न-परसवर्णोद्देशहल्घटित
हो तो उसमें अश्राव्यता—श्रुतिकटुता नहीं आती । इसके दो कारण हैं—एक तो यह
कि उस संयोग का घटक पूर्ववर्त्ती व्यञ्जन पूर्व-पद का अन्त्यावयव होता और इस
लिए उस परसवर्णनिष्पन्न व्यञ्जन तथा परवर्त्ती पद के आद्य व्यञ्जन का संयोग
उत्तरवर्त्ती पद का आद्य अवयव होता ही नहीं, उसका अवयव तो उस संयोग का
केवल परवर्त्ती व्यञ्जन होता जो स्वयं में संयोग नहीं हैं। दूसरा कारण यह है कि
परसवर्णनिष्पन्न संयोग स्वरूपतः मधुर होता जिससे उस संयोग के ह्रस्व या दीर्घ
स्वर के परवर्त्ती होने पर भी उसमें अश्राव्यता आ ही नहीं सकती। जैसे—
'तान्तमालतरुकान्ति....' इत्यादि पूर्वोदाहृत पद्य में 'न्त' और 'न्ति' में जो संयोग हैं
वे दीर्घ स्वर से परवर्त्ती होने पर भी उक्त कारणों से अश्राव्य नहीं हैं। यह विचार
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