रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४२ रसगङ्गाधरः
अथ दीर्घानन्तर्यं संयोगस्य भिन्नपदगतस्य सकृदप्यश्रव्यम्; (असकृत्तु
सुतराम्) ॥
हरिणीप्रेक्षणा यत्र गृहिणी न विलोक्यते ।
सेवितं सर्वसंपद्भिरपि तद्भवनं वनम् ॥
असकृत्तु सुतराम्¹। यथा—‘एषा प्रिया मे क्व गता त्रपाकुला ।’
इत्यत्र चतुर्णां संयोगः । प्रपञ्च्यतामित्यादौ त्र्यादीनां संयोगस्य श्रुतिकटुत्वाभावात्
प्रायेणेत्युक्तम् । दीर्घानन्तर्यमित्यत्र दीर्घो न संयोगपरो ह्रस्वो विवक्षितः । अस-
कृदिति । सरूपस्य विरूपस्य वेति नानयोर्विशेषः । सुतरामित्यस्याधिकमित्यर्थः ।
अग्रे वर्णनादिदं प्रक्षिप्तमत्र ।
हरिणीत्यादि । यत्र भवने हरिण्याः प्रेक्षणमिव प्रेक्षणं यस्यास्तादृशी गृहिणी
प्रियतमा न विलोक्यते तद्भवनं सर्वसम्पद्भिः परिपूर्णमपि वस्तुतो वनं निवासायो ग्यं
स्थानमेव गृहस्थस्य कृत इत्यर्थः । वनशब्दोऽत्रौपचारिकः । अत्र च पद्ये प्रेक्षणेति
उत्तरपदादेः प्रेतिसंयोगस्य णीशब्दोत्तरं सत्त्वादश्रव्यत्वम् । असकृदित्यादि ।
ष् ट् र् का संयोग और ‘ष्ट्र्यः’ शब्द में ष्-ट्-र्-य् का संयोग अश्रव्य है । कभी-
कभी इनमें अश्रव्यत्व नहीं भी होता । जैसे—‘सन्त्वमी’ इत्यादि शब्दों में न्-त्-व्
का संयोग । इसी प्रकार अन्य अश्रव्यत्व—श्रुतिकटुत्व के भेदों का अनुसन्धान
पाठक को अपने अनुभव के आधार पर स्वयं करना चाहिए ।
दीर्घ स्वर² के बाद यदि भिन्न-पदगत एक भी संयोग हो तो वह अश्रव्य होता,
अनेक होने पर तो कुछ कहना ही नहीं । जैसे—‘हरिणीप्रेक्षणा यत्र ⋯, इत्यादि
पद्य में ‘णी’ इसके बाद ‘प्रे’ इस संयोग में अश्रव्यता है । इसी प्रकार ‘हरिणीप्लुता’
शब्द में ‘णी’ के बाद ‘प्लु’ इस संयोग में भी अश्रव्यता है हीं । उदाहृत पद्य का
अर्थ इस प्रकार है :—
“जिस भवन में मृगनयनी गृहिणी न देखी जाय वह सभी सम्पत्तियों से युक्त
होने पर भी भवन नहीं, अपितु वन हीं है ॥”
परन्तु दीर्घ-स्वर के बाद यदि भिन्न-पदगत संयोग बारम्बार¹ आये हों
१. अग्रे मुद्रितोऽप्ययं पाठः प्रसङ्गानुरोधादत्रास्माभिः स्थापितः ।
२. यहाँ स्वाभाविक दीर्घ-स्वर विवक्षित है, पारिभाषिक नहीं ।
३. 'विवक्षितमित्यदोषः' इस परवर्त्ती ग्रन्थ के बाद मुद्रित—'असकृत्तु सुतराम् ।
यथा—'एषा प्रिया मे क्व गता त्रपाकुला ।" अंश को 'हरिणीप्रेक्षणा' आदि
पद्य के बाद औचित्य के आधार पर मैंने रखा है । इसी से यहीं इस अंश की
व्याख्या की गयी है ।