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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 273

प्रथमाननम् २४१
इदं तु बोद्धव्यम्—गुरुर्ययोर्व्यवधायकस्तयोरेव वर्णयोरानन्तर्यकृतम-
श्रव्यत्वमपवदति । तेनात्र थकारतकारानन्तर्यकृतदोषापवादेऽपि तकार-
थकारानन्तर्यकृतमश्रव्यत्वमनपोदितमेव ।
एव त्र्यादीनां संयोगोऽपि प्रायेणाश्रव्यः—'राष्ट्रं तवोष्ट्र्यः परितश्च-
रन्ति' इति । एवमादयः श्रुतिकटुत्वभेदा अन्येऽप्यनुभवानुसारेण बोध्याः ।
सङ्गरस्थलं रणभूमिः तस्य तस्य तुरगस्य ताण्डवैः रङ्गाङ्गणं नृत्यशालेवाभातीति
पदार्थाः । रङ्गाङ्गणेत्यत्र णत्वं चिन्त्यम् । अनेककर्तृकत्वात्ताण्डवानां बहुत्वमुक्तम् ।
अत्र च पद्ये चतुर्थपादे 'तत्तत्···' इत्यत्र प्रथमद्वितीययोर्ह्रस्वाकारयोः संयोगपरत्वेन
तद्व्यवधानादश्रव्यत्वाभावः । '(आभा) ति त···' इत्यत्र तु ह्रस्वेकारव्यवधानेऽपि
स्वानन्तर्यसत्त्वादश्रव्यत्वमनपोदितमेव मन्तव्यम् । अत्र परसवर्णभूयस्त्वं दोषः ।
प्रकारान्तरमाह—एवमित्यादि । त्र्यादीनामित्यत्रादिशब्दश्चतुर्णां ग्राहकः,
तदधिकानां संयोगस्याऽप्रसिद्धत्वात् । राष्ट्र इत्युदाहरणे ष्ट्र इत्यत्र त्रयाणां ष्ट्र्य
अकार के स्वरूपतः दीर्घ होने से नहीं, अपितु उसके संयोग-पूर्वक होने से) इसके
अतिरिक्त संयोग-पूर्ववर्त्ती ह्रस्व-स्वर के पारिभाषिक गुरुत्व-दीर्घत्व को लेकर दीर्घ-
स्वर के व्यवधान के आधार पर अश्रव्यता के अभाव का (एक अन्य) उदाहरण
'सदा जयानु··· तत्तत्तुरगताण्डवैः' इस पद्य में द्रष्टव्य है। यहाँ 'तत्तत्···' आदि शब्द
में दो तकार-द्वयों का आनन्तर्य संयोगपूर्वत्व-निमित्तक गुरु-दीर्घ-स्वर के व्यवधान के
कारण अश्रव्यताधायक नहीं है । इस पद्य का अर्थ यह है—
"जिनका जय के साथ नित्य सम्बन्ध बना हुआ है ऐसे अङ्गदेश के राजाओं
की युद्धभूमि विभिन्न अश्वों के ताण्डव से नृत्य-शाला के समान शोभित हो
रही है ।"
इस प्रसङ्ग में यह ज्ञातव्य है कि जिन दो के बीच स्वाभाविक या पारिभाषिक
दीर्घ-स्वर होता उन्हीं दोनों के आनन्तर्य में अश्रव्यतापादकता नहीं होती; गुरु-
व्यवधानरहित व्यञ्जनों, चाहे जिनके बीच दीर्घ स्वर हो उन्हीं में से कोई एक
क्यों न हो, के आनन्तर्य में तो अश्रव्यता होगी हीं । अतएव 'यथा यथा····' इत्यादि
उदाहरण में 'तथा' शब्द मे तकार-थकार के और 'तत्तु' शब्द में तकार तकार
के आनन्तर्य से अश्रव्यता बनी हीं है । इसी प्रकार, 'सदा जयानु····' इत्यादि
उदाहरण में भी '(····भा) ति त (त्तुरग····)' के आनन्तर्य से जो अश्रव्यता है
वह भी अक्षुण्ण है ।
उपर्युक्त अश्रव्यता के समान तीन-चार व्यञ्जनों का संयोग भी सामान्यतया
अश्रव्य होता । जैसे —'राष्ट्रं तवोष्ट्र्यः परितश्चरन्ति' इस पद्यांश में 'ष्ट्र' शब्द में