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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 272, कुल 414 में से

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पृष्ठ 272

२४० रसगङ्गाधरः
यथा वा—
यथा यथा तामरसायतेक्षणा मया सरागं नितरां निषेविता ।
तथा तथा तत्त्वकथैव सर्वतो विकृष्य मामेकरसं चकार सा ॥
इदं तु दीर्घव्यवाये । संयोगपरव्यवाये तु—
सदा जयानुषङ्गाणामङ्गानां सङ्गरस्थलम् ।
रङ्गाङ्गणमिवाभाति तत्तत्तुरगताण्डवैः ॥
यथा यथेत्यादि-पद्यपूर्वार्द्धे 'या ता' इत्यत्र, पद्योत्तरार्धे च 'तथा तथा
तत्त्व' इत्यत्र 'यात' 'यात' इत्यनयोर्गुरुव्यवायेनाश्रव्यत्वनिरासः । 'तथा तथा'
इत्यत्र तु तकारथकारयोर्गुरुव्यवायाभावादानन्तर्यं भवत्येवाश्रव्यमिति वक्ष्यति—इदं
तु बोद्धव्यमित्यादिग्रन्थेन । तत्त्वशब्दे तु प्रथमतकारोत्तराकारस्य संयोगपरतया
गुरुत्वेन तद्व्यवायान्नाश्रव्यत्वमिति बोध्यम् । प्रकृतपद्ये तामरसायतेक्षणेत्यस्य
कमलोत्फुल्लोचनेत्यर्थः । एकरसमित्यत्रैकशब्दो नायिकार्थकः, उपमाने तु ब्रह्मार्थको
बोध्यः ।
'संयोगे गुरु' इति शास्त्रानुसारेण प्रसिद्धमूलकेन संयोगपूर्ववर्तिनो ह्रस्वस्यापि
पारिभाषिकं गुरुत्वमस्त्येवेति तद्व्यवायेऽपि गुरुव्यवायकृतमश्रव्यत्वाभावमाह—
संयोगेत्यादिना ।
सदा जयेत्यादि । सर्वदा जयेऽनुषङ्गः सम्बन्धो येषान्तेषामङ्गदेशाधिपाना
अन्य उदाहरण भी देखिए—'यथा यथा ताम··· तत्त्व' आदि पद्य में। इसमें '(य)
था ता (म···)' में द्वितीय-प्रथम का आनन्तर्य दीर्घ-स्वर के व्यवधान के कारण अश्रव्य
नहीं है । इसी प्रकार उत्तरार्ध में '(त) था त' और 'था तत्त्व' में दीर्घ-स्वर के
व्यवधान से अश्रव्यता का निराकरण हो जाता है । 'त(त्त्व)' में त कारोत्तरवर्ती
अकार में 'संयोगे गुरु' के अनुसार दीर्घत्व ज्ञातव्य है । किन्तु 'तथा-तथा' में प्रथम-
तृतीय के आनन्तर्य में तो सूक्ष्म अश्रव्यता है हीं । इसी प्रकार 'तत् (व)' में स्वा-
नन्तर्य-प्रयुक्त अश्रव्यता वर्तमान है । 'मामे····' में पञ्चम का स्वानन्तर्य-प्रयुक्त
अश्रव्यता का भी दीर्घ व्यवधान के कारण अभाव ज्ञातव्य है । पद्यार्थ इस प्रकार है—
“ज्यों ज्यों मैं कमल के समान विकसित नेत्रों वाली इस कामिनी की अधिका-
धिक सेवा (सम्पर्क) करता गया त्यों-त्यों तत्त्व-कथा की तरह इसने मुझे सब तरफ
से मोड़कर एकरस कर दिया ।” तात्पर्य यह है कि जैसे तत्त्वविद्या-सम्पन्न व्यक्ति
को सर्वत्र-सर्वदा तत्त्व —ब्रह्म हीं ब्रह्म दीखता है वैसे हीं मुझे सर्वत्र-सर्वदा यही
कामिनी दीखती है ।
ये सब उदाहरण स्वतः दीर्घ-स्वर के व्यवधान से अश्रव्यता के निराकरण के
हैं । (इनमें भी 'तत्त्व' शब्द में जो दीर्घ-स्वर का व्यवधान है वह तकारोत्तरवर्ती