रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् २३९
न्तर्यम् । प्रथमतृतीययोर्द्वितीयतृतीययोर्वाऽऽनन्तर्यं तु तथा नाश्राव्यम्, किं
त्वीषत्, निर्माणमार्मिकैकवेद्यम् । एतदप्यसकृच्चेत्ततोऽधिकत्वात्साधारणे-
रपि वेद्यम् । यथा—'खग कलानिधिरेष विजृम्भते', 'इति वदति
दिवानिशं स धन्यः' । पञ्चमानां मधुरत्वेन स्ववर्ग्यानन्तर्यं न तथा ।
यथा- 'तनुते तनुतां तनौ' । स्वानन्तर्यं त्वश्राव्यमेव । यथा—'मम
महती मनसि व्यथाविरासीत्' ।
एतानि चाश्राव्यत्वानि गुरुव्यवायेनापोद्यन्ते । यथा—'संजायतां कथंकारं
काके केकाकलस्वनः' ।
अधिकम् । ईषदित्यस्य तात्पर्यमाह—निर्माणमार्मिकैकवेद्यमिति । स्वानन्तर्यम् =
वर्गस्थपञ्चमानां स्वानन्तर्यमित्यर्थः ।
सञ्जायतामित्यादौ 'काके', 'केके', 'केका', 'काक' इत्यत्र च गुरुव्यवायः ।
द्वितीय व्यंजनों तथा तृतीय और चतुर्थ व्यंजनों के विषय में हीं समझनी
चाहिए । जहाँ तक समानवर्गीय प्रथम-तृतीय और द्वितीय-तृतीय व्यञ्जनों के भिन्न
पदों में एक वार आनन्तर्य का प्रश्न है, अश्रव्यता तो उसमें भी है हीं, किन्तु
अत्यल्प । इसे कुछ विशिष्ट रचनाकार—कवि हीं समझ सकते, साधारणजन नहीं,
जब कि पूर्व-वर्णित अश्रव्यता तो साधारण जन के भी समझ में आ जाती है। हाँ,
यदि इनका भी आनन्तर्य अनेक वार हो तो स्पष्ट रूप में अश्रव्यता आ हीं जाती
है जिसका साधारणजन को भी अनुभव हो हीं जाता है । 'जैसे 'ख-ग-क' इस प्रकार
द्वितीय-तृतीय-प्रथम समानवर्गीय व्यंजनो के प्रयोग से जो अश्रव्यता है वह सुस्पष्ट
है । इसी प्रकार 'इति वदति दिवानिशं······' इस वाक्य में भी 'द-ति-दि' यह
आनन्तर्य-प्रयोग सुस्पष्ट रूप में अश्रव्य है हीं । किन्तु सभी वर्गों के पञ्चम व्यंजनों
के मधुर होने से इनका यदि स्ववर्गीय व्यंजनों से आनन्तर्य हो तो भी उसमें
अश्रव्यता नहीं आती । जैसे 'तनुते तनुतां तनौ' इस वाक्य में प्रथम-पञ्चम का
अनेक बार आनन्तर्य होने पर भी अश्रव्यता नहीं आई है। हाँ, यदि समान पंचम
व्यञ्जनों का आनन्तर्य हो तब अश्रव्यता आ हीं जाती है । जैसे—'मम महती
मनसि····' इत्यादि वाक्य में ।
यदि उपर्युक्त अश्रव्यताधायक एक अथवा एकवर्गीय व्यंजनों के मध्य गुरु-
स्वर (दीर्घ-स्वर) हो तो उपर्युक्त अश्रव्यता नहीं आती । जैसे—'संजायतां ····
काके केकाकल····' इत्यादि वाक्य में 'काके' 'केके', 'केका' और 'काक' शब्दों में
दीर्घ-स्वर के व्यवधान के कारण अश्रव्यता नहीं है ।