रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 269, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् २३७
अत्र गुणान्तरासमानाधिकरणः प्रसादः ॥
इदानीं तत्तद्गुणव्यञ्जनक्षमाया निर्मितेः परिचयाय सामान्यतो विशेष-
तश्च वर्जनीयं किञ्चिन्निरूप्यते—वर्णानां स्वानन्तर्यं सकृदेकपदगतत्वे
किंचिदश्रव्यम् । यथा—‘ककुभसुरभिः, विततगात्रः, पललमिवाभाति’
इत्यादौ । असकृच्चेदधिकम् । यथा—‘वितततरस्तरुरेष भाति भूमौ ।’
पराध्यन्तं मां स्वकीयेषु परिजनेषु बिभ्रतस्त्वत्त उत्कृष्टतरोऽन्यो दयानिधिर्नास्ति,
नापि मदधिकतरः कश्चनान्यो मत्त उन्मत्तोऽस्तीति पद्यार्थः ।
अत्र प्रसादस्य गुणान्तराऽसामानाधिकरण्यं कथमिति विवेचनीयम् । ‘मत्तो न
मत्तः’ इत्यत्र दीर्घसमासाभावात् कथञ्चिदोजस अभावोपपादनेऽपि पदविशेषे वाचे-
त्यादौ माधुर्यस्याभावो न स्वीकृतुं शक्यते यतः । पदसमूहात्मकमंशमादाय वा पदे
वर्त्तमानस्यापि गुणान्तरस्यात्राऽनभिव्यञ्जनमिति संगमनीयं कथञ्चित् । समूह-
श्चाव्यवहितानामिति तु प्रसिद्धमेव । वस्तुतश्चिन्त्यमेवैतत् ।
ककुभेत्यादि । अत्र ककारस्य स्वानन्तर्यम् । यद्यप्यत्रापि पूर्वककारोत्तर-
ककारयोरकारेण व्यवधानादानन्तर्यं नास्ति तथापि व्यञ्जनस्फुटोच्चारणार्थं ह्रस्व-
स्याकारस्य प्रसिद्धतया तदतिरिक्तह्रस्वाकारस्यापि तज्जातीयत्वेन तद्व्यवधानेऽ-
दया-निधान है और न मुझसे बढ़कर कोई उन्मत्त-कर्त्तव्यच्युत अधम ।"
इस पद्य में ग्रन्थकार का कहना है कि यहां केवल प्रसाद-गुण है, अन्य कोई
गुण नहीं। परन्तु चतुर्थ चरण में ( विशेष कर ‘मत्तो न मत्तः’ इस अंश में) ओजो-
व्यञ्जकता क्यों न मानी जाय—यह विचारणीय है ॥
अब भिन्न-भिन्न गुण की व्यंजकता में समर्थ रचना का परिचय देने के लिये
सभी गुणों के व्यंजक रचनाओं में और गुणविशेष-व्यंजक रचना-विशेष में जिन वर्ण-
विशेषों का प्रयोग वर्जनीय है उनका क्रमशः निरूपण किया जा रहा है। इनमें
प्रथमतः सामान्यरूप में वर्जनीय क्या हैं यह बताया जा रहा है—
किसी भी व्यजन का एक पद में बिना व्यवधान¹ के दो बार प्रयोग नहीं करना
चाहिए, क्योंकि इससे वह पद ( तथा तत्पदघटित वाक्य भी ) अश्रव्य—सुनने में
अप्रिय हो जाता है । जैसे—‘ककुभसुरभिः’, ‘विततगात्रः’, ‘पललमिवाभाति’
इत्यादि शब्दों में एक पद में क्रमशः ‘कक’, ‘तत’ और ‘लल’ के प्रयोग से अश्रव्यता
आ गई है । यदि दो से अधिक बार प्रयोग किया गया हो तब तो और भी
अधिक अश्रव्यता आ जाती है । यथा—‘वितततरस्तरुः’ इस शब्द में एक हीं
१. अकार का व्यवधान अथवा किसी अन्य ह्रस्वस्वर का व्यवधान होने पर भी
ग्रन्थोक्त आनन्तर्य—अव्यवधान मान्य है ।