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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 268

२३६ रसगङ्गाधरः
ल्यात् । किं बहुना ! रसस्यौजस्विनोऽमर्षादेर्भावस्य चाविवक्षायामपि वक्तरि
क्रुद्धतया प्रसिद्धे, वाच्ये वा क्रूरतरे, आख्यायिकादौ प्रबन्धे वा, परुष-
वर्णघटनेष्यते । यथा वा—
वाचा निर्मलया सुधामधुरया यां नाथ शिक्षामदा-
स्तां स्वप्नेऽपि न संस्पृशाम्यहमहंभावावृतो निस्त्रपः ।
इत्यागःशतशालिनं पुनरपि स्वीयेषु मां बिभ्रत-
स्त्वत्तो नास्ति दयानिधिर्यदुपते मत्तो न मत्तः परः ॥
इत्यादिनोपदेशेन सूचिता इति बोध्यम् । अत्र क्रोधस्य स्थायित्वे शृङ्गारभङ्गप्रसङ्ग
इत्यतस्तस्यात्र व्यभिचारित्वमुपपादयति—किं बहुनेत्यादिना । वाच्ये = विवक्षि-
तेऽर्थे । प्रबन्धे वेत्यत्र वा-शब्दः समुच्चये, तेन मुक्तकस्यापि संग्रहः ।
सम्प्रति प्रसादस्यासङ्कीर्णोदाहरणमप्याह—यथा वेत्यादिना ।
वाचेत्यादि । हे नाथ यदुपते ! निर्मलया सुधामधुरया च वाचा श्रुतिगीतादि-
रूपया त्वं मह्यं यां शिक्षामदास्तामहमहङ्कारावृतविवेकोऽत एव निर्लज्जः स्वप्नेऽपि
किमुत जाग्रद्दशायां न संस्पृशामि नानुसरामि । संस्पृशामीत्यस्य स्मरामीति
रसचन्द्रिकाव्याख्यानमसत्, विरुद्धत्वात् । जाग्रत्स्वप्नयोरनुसरणं वाच्यमेव, सुषुप्तौ
तु तदसम्भव एवेति भावः । एतेन सर्वावसरेषु शिक्षोपेक्षा गम्यते । अत एव
पुनः पुनरुपेक्षया आगःशतशालित्वमुपपद्यते । तथाविधमपि क्रियासमभिहारेण·
नायिका को समझाते-बुझाते वह थक चुकी है, पर वह मूढ़ नायिका अपना हठ
छोड़ने को तैयार नहीं । यह तथ्य उत्तरार्ध में निर्दिष्ट वर्णन से भी स्पष्ट होता है ।
इस विषय में (कि शृङ्गार आदि रसों में भी कदाचित् क्रोध की अभिव्यक्ति उचित
है) अधिक कहने की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि ओजोगुण-युक्त रसों की और
उनके अमर्ष आदि व्यभिचारिभावों को अभिव्यक्ति के अभिप्रेत न होने पर भी
आख्यायिका आदि गद्य-काव्यों और प्रबन्ध-काव्यों में ओजो-व्यंजक रचना देखी
जाती है यदि वक्ता स्वभावतः क्रोधी हो अथवा वक्तव्य अर्थ हीं क्रूर—कठोर हो
तो । अतः उक्त उदाहरण में अंशतः ओजो-व्यंजक रचना अनुचित नहीं है ।
अथवा दूसरा उदाहरण—जिसमें केवल प्रसाद है, अन्य कोई गुण नहीं—'वाचा
निर्मलया······' आदि पद्य है । पद्यार्थ निम्नलिखित है—
"हे भगवन् ! में अहङ्कार से ओतप्रोत ऐसा निर्लज्ज अधम हूँ कि तुमने
निर्मल और अमृत के समान मधुर वेदादि शास्त्रों द्वारा मुझे जो उपदेश दिये उनका
तो मैं स्वप्न में भी पालन नहीं करता, फिर भी तुमने असंख्य अपराध करने वाले
मुझे अपने परिजनों में स्थान दे दिया है । अतः हे यदुनाथ ! न तो तुम से बढ़कर कोई