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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 261

प्रथमाननम् २२९
रूपा न गुणान्तर्भावमर्हन्ति, अन्यथा प्रतिश्लोकमर्थवैचित्र्यवैलक्षण्याद्गुण-
भेदापत्तेः । अनधिकपदत्वात्मा प्रसादः, उक्तिवैचित्र्यवपुर्माधुर्यम्, अपारुष्य-
शरीरं सौकुमार्यम्, अग्राम्यरूपोदारता, वैषम्याभावलक्षणा समता. साभि-
प्रायत्वात्मकः पञ्चम ओजसः प्रकारः, स्वभावस्फुटत्वात्मिकार्थव्यक्तिः,
स्फुटरसत्वरूपा कान्तिश्च, अधिकपदत्वानवीकृतत्वामङ्गलरूपाश्लील ग्राम्य-
भग्नप्रक्रमापुष्टार्थरूपाणां दोषाणां निराकरणेन स्वभावोक्त्यलङ्कारस्य
रसध्वनिरसवदलंकारयोश्च स्वीकरणेन च गतार्थानि । समाधिस्तु कविगतः
काव्यस्य कारणं न तु गुणः, प्रतिभाया अपि काव्यगुणत्वापत्तेः । अतस्त्रय एव
गुणभेदः=गुणानन्त्यम् । 'तदभावेऽपि काव्यव्यवहारप्रवृत्तेः' इति प्रकाशोक्तो हेतु-
रहेतुः, परैरेषां काव्यमात्रगुणत्वास्वीकारात् । अन्यथा गुणत्रयवादेऽपि प्रत्येकस्य
काव्यमात्रगतत्वाभावाद् अगुणत्वप्रसङ्गादिति पण्डितराजाशयः । अनधिकेत्यारभ्य
पञ्चम ओजसः प्रकार इत्यन्ते ग्रन्थे वर्णितानां वामनाद्यभिमतानां प्रसादादीनां
गुणानां क्रमशःअन्तर्भाव उच्यतेऽधिकपदत्वादिदोषाणामभावेषु—अधिकपदत्व . . . .
निराकरणेनेति । अर्थव्यक्तेः स्वभावोक्त्यलङ्कारे, कान्तेश्च यथासम्भवं रसध्वनौ
रसवदलङ्कारे चान्तर्भाव उच्यते—स्वभावोक्तीत्यादिना । अत्र विशेषः काव्य-
प्रकाशतट्टीकादिभ्योऽवसेयः । कारणमिति । ग्रन्थनीयार्थस्य कविकर्तृकालोचनाभावे
उक्तिवैचित्र्य मात्र है, इनको गुण कहना अनुचित है । अन्यथा—यदि उक्तिवैचित्र्य
को भी गुण माना जाय तो प्रत्येक श्लोक में भिन्न-भिन्न प्रकार के उक्तिवैचित्र्य को
एक-एक गुण कहना होगा । ऐसी स्थिति में दश हीं नहीं, अपितु अनन्त गुण हो
जायेंगे । प्रतिपाद्य अर्थ से (कम या) अधिक शब्दों के प्रयोग का अभाव, जिसे
प्राचीनों ने प्रसाद-नामक अर्थगुण कहा है, (न्यून-पदत्व दोष अथवा) अधिक-पदत्व-
दोष का अभाव हीं है, कोई भावात्मक गुण नहीं । उक्तिवैचित्र्य, अर्थात् एक हीं
अर्थ का भङ्गिभेद से पुनः कथन उनके मत में माधुर्य-नामक अर्थगुण है; यह वस्तुतः
अनवीकृतत्व-दोष का अभाव है। जिस अपारुष्य को उन्होंने सौकुमार्य-नामक अर्थगुण
कहा है वह भी अश्लीलता-दोष के घटक अमङ्गल का अभाव हीं है । उदारता-
नामक उनका अर्थगुण तो ग्राम्यत्व-दोष का अभाव-मात्र है—यह उन्हीं के लक्षण से
स्पष्ट है । उनकी वैषम्याभावरूप समता भी भग्नप्रक्रमता-दोष के अभाव से
अतिरिक्त कोई भावात्मक गुण नहीं । विशेषण की साभिप्रायता को उन्होंने
ओज का पञ्चम प्रकार कहा है, किन्तु यह भी वस्तुतः अपुष्टार्थत्व-दोष का अभाव-
मात्र है । स्वभाव-स्फुटता (-सम्पादक वर्णन) जो उनके मत में अर्थव्यक्ति नामक
अर्थगुण है, गुणत्रयवादियों के स्वभावोक्त्यलङ्कार का हीं नामान्तर है । स्फुटरसत्व
को कान्ति-नामक अर्थगुण माना है, परन्तु यह तो रस की प्रधानता होने पर रस-