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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 259, कुल 414 में से

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पृष्ठ 259

प्रथमाननम् २२७
भवि इति वाच्यम् । माधुर्याभिव्यञ्जके प्रसादाभिव्यञ्जके वेति सुवच-
त्वात् । माधुर्यं तु परेषामस्मदभ्युपगतमाधुर्यव्यञ्जकमेव । एवं च सर्वत्र
व्यञ्जके व्यङ्ग्यशब्दप्रयोगो भाक्तः । समता तु सर्वत्रानुचितैव, प्रति-
पाद्योद्भटत्वानुद्भटत्वाभ्यामेकस्मिन्नेव पद्ये मार्गभेदस्येष्टत्वात् ।
व्यञ्जकशब्दधर्मे प्रयोगो भाक्तः । एवमेव व्यङ्ग्यरसप्रतिपादकस्य मधुरादिशब्दस्यापि
तद्व्यञ्जकरचनाविशेषप्रतिपादनाय प्रयोगोऽपि भाक्त एवेत्याह-एवमित्यारभ्य
भाक्त इत्यन्तेन ग्रन्थेन । समता = उपक्रमादायमाप्तं रीत्यभेदरूपा । प्रतिपाद्यः =
अर्थः । इष्टत्वादिति । अत्र कश्चिद् विशेषः साहित्यदर्पणादिभ्योऽवसेयः । इदं तु
चिन्त्यम्-यत्रोपक्रमादुपसंहारपर्यन्तममुद्भूतस्यैवार्थस्य प्रतिपादनमिष्टं तत्र समता
कथमनुचितेति । यथा चैकस्मिन्नेव पद्ये प्रतिपाद्योद्भटत्वानुद्भटत्वाभ्यां गुणत्रय-
वादिनामपि नानागुणयोगित्वमभिमतं तथैव प्रकृतोदाहरणेऽपि कथं न सम्भवतीति ।
उपधेयसङ्करस्तु उपाधीनामसाङ्कर्याद् वामनादिमते न दुष्यति । रससंकरादाहरणेषु
च गुणत्रयवादिनां गत्यन्तराभावोऽपीति ।
रचना में और शिथिलांश का माधुर्याभिव्यञ्जक रचना में अथवा प्रसादाभिव्यञ्जक
रचना में यथासम्भव अन्तर्भाव हो जाता है। यह स्मरणीय है कि वामनादिसम्मत
माधुर्य गुण गुणत्रयवाद्यभिमत माधुर्य गुण नहीं, अपितु इसका व्यञ्जक है (और
माधुर्य गुण इससे व्यङ्ग्य है) । इसी प्रकार वामनादिसम्मत ओज आदि गुण भी
गुणत्रयवादिसम्मत ओज आदि गुणों के अभिव्यञ्जक हैं। अतः स्पष्ट है कि व्यङ्ग-
भूत गुणविशेषवाचक माधुर्य आदि शब्दों का माधुर्यादि के व्यञ्जक रचना-विशेषों के
लिए जो वामनादि द्वारा प्रयोग किया गया है वह (= व्यङ्ग्यार्थ-वाचक माधुर्यादि
शब्दों का व्यञ्जकीभूत रचना के अर्थ में प्रयोग) औपचारिक है ।
जहाँ तक समता-नामक प्राचीन-सम्मत शब्दगुण का प्रश्न है वह तो सर्वत्र-
सम्पूर्ण काव्य में नितान्त अनुचित है (अतः इस रूप में यह दोष है, गुण नहीं),
क्योंकि एक ही काव्य में प्रतिपाद्य अर्थ की उत्कटता और उसकी अनुत्कटता के
आधार पर क्रमशः समता और विषमता होनी चाहिये, न कि सम्पूर्ण में समता
हीं । उदाहरणार्थ 'निर्माणे यदि ...' पद्य में अर्थ की उत्कटता-प्रौढ़ता के कारण
प्रथम तीन चरणों में गाढ़ता और चतुर्थ चरण में अर्थ की अनुत्कटता-शिथिलता के
कारण रीति में जो विषमता-शिथिलता है वही गुण है। यदि यहाँ चतुर्थ चरण
मे भी प्रथम तीन चरणों की तरह गाढ़ता या प्रथम तीन चरणों में हीं चतुर्थ चरण
की तरह शिथिलता हाती तो दोष हीं होता ।
१७ र०