रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् २२५
तच्च स्फुटप्रतीयमानरसत्वम् । उदाहरणं च वर्णितमेव रसप्रकरणे,
वर्णयिष्यते च ।
अवर्णितपूर्वोऽयमर्थः पूर्ववर्णितच्छायो वेति कवेरालोचनं
समाधिः ॥
ज्ञानस्य विषयतासंबन्धेनार्थनिष्ठत्वादर्थगुणता ।
आद्यो यथा—‘तनयमैनाकगवेषण-’ इत्यादौ । द्वितीयस्तु प्रायशः
तच्च = दीप्तरसत्वं च । वर्णितमेवेति । ‘शयिता सविधेऽप्यनीश्वरा.........’
इत्यादौ वर्णयिष्यत इत्यस्य यथासम्भवमलङ्कारादिप्रकरण इति शेषः ।
अवर्णितपूर्वेत्यादि । इमावेवार्थौ वामनेन क्रमशः ‘अयोनिः’, ‘अन्यच्छायायोनिः’
इति कथितौ । वामनेन पुनरुभावप्यर्थौ व्यक्तसूक्ष्माभ्यां द्विधा, अनयोरपि सूक्ष्मो
द्विविधो भाव्यवासनीयभेदाभ्यामित्युक्तम् ।
अर्थविषयकालोचनस्य कविनिष्ठत्वेन कथमर्थनिष्ठत्वमित्याशङ्कामपाकरोति—
ज्ञानस्येत्यादिना । समवायेन कवौ वर्त्तमानमप्यालोचनं विषयतासम्बन्धेनार्थनिष्ठ-
मेवेत्यस्य ज्ञानमात्रस्य विषयतयाऽर्थनिष्ठत्वादित्यर्थः । एतच्च विषयताया
वृत्तिनियामकसम्बन्धत्वस्वीकार एवोपपद्यते ।
‘तनयमैनाक’ इत्यादिगद्यसन्दर्भो मध्यमकाव्योदाहरणतया व्याख्यातः । प्रायश
रस की दीप्तता का अर्थ उसकी स्फुट रूप में अभिव्यक्ति है। इसका उदाहरण
रस-निरूपण के सन्दर्भ में दिया जा चुका है। वहाँ ‘शयिता सविधेऽप्यनीश्वरा...’
आदि पद्य में विप्रलम्भ-शृङ्गार रस की स्फुट अभिव्यक्ति बतलाई गई है।
आगे भी ध्वनि-अलङ्कार आदि के निरूपण के अवसर पर इसके अनेक उदाहरण
दिये जायेंगे।
काव्य रचना करते समय कवि का यह चिन्तन कि वह जिस अर्थ का अपने
काव्य में उपनिबन्ध करने जा रहा है वह पहले किसी कवि द्वारा वर्णित नहीं हुआ
है—अपूर्व अर्थ है या वह अर्थ पूर्व कवि द्वारा वर्णित अर्थ का हीं साक्षात् या
प्रकारान्तर से अनुकरण है, ‘समाधि’ नामक अर्थगुण है।
यद्यपि यह ‘समाधि’-स्वरूप गुण समवाय-सम्बन्ध से तो कविनिष्ठ हीं है तथापि
विषयता-सम्बन्ध से अर्थनिष्ठ होने के कारण अर्थगुण माना गया है, क्योंकि ज्ञान-
मात्र विषयता-सम्बन्ध से अर्थनिष्ठ होता।
अपूर्व अर्थ के उपनिबन्ध का एक उदाहरण वही है जो मध्यम काव्य का उदा-
हरण पहले ‘तनयमैनाकगवेषण...’ इत्यादि यमुना-वर्णनात्मक गद्य दिया जा चुका
है। पूर्ववर्णित अर्थ का अनुकरणात्मक उपनिबन्ध तो प्रायः, कुछ काव्यों को छोड़