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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 255

प्रथमाननम् २२३
तपस्यतो मुनेर्वक्त्राद्वेदार्थमधिगत्य सः।
वासुदेवनिविष्टात्मा विवेश परमं पदम् ॥
अत्र मुनिस्तपस्यति, तद्वक्त्रात्स वेदार्थमधिगतवान्, तदनन्तरं वासुदेवे
परब्रह्मणि मनः प्रावेशयत्, ततश्च मुक्तोऽभूदिति वाक्यार्थकलापः शतृ-
क्त्वा-बहुव्रीहिभिस्तिङन्तेन चानुवाद्यविधेयभावेनैकवाक्यार्थीकृतः ।
साभिप्रायत्वं च प्रकृतार्थपोषकता ।
चतुर्थस्योदाहरणम्—तपस्यत इति । मुक्तोऽभूदिति चतुर्थपादार्थ उक्तः । शतृ-
प्रत्ययोऽत्र तपस्यत इति पदे, क्त्वाप्रत्ययोऽधिगत्येत्यत्र, तृतीये च पादे बहुव्रीहिश्चतुर्थे
विवेशेति तिङन्तम् । सर्वासां क्रियाणां तिङन्तेन कृदन्तेन वा शब्देनाभिधाने वाक्य-
चतुष्टयं स्यात्, तत्स्थाने त्रयं क्रमशः शतृप्रत्ययादिना क्रियाप्रतिपादनपूर्वकमुद्देश्य-
विशेषणतयोद्देश्यीकृतं तिङन्तप्रतिपाद्यायाः परमपदनिवेशक्रियाया विधेयाया इत्येक-
वाक्यत्वं स्पष्टम्, प्रधानीभूतक्रियायास्तिङन्तपदोपस्थाप्याया विशिष्टस्योद्देश्यस्य
चैकत्वादित्यभिसन्धानेनोक्तम् --अनुवाद्येत्यादिना । अनुवाद्यम् = शाब्दमुद्देश्यम् ।
पञ्चमं प्रकारं व्याचष्टे---साभिप्रायत्वमिति । प्रकृतार्थस्य पोषकत्वमुपपाद-
"तपस्या करते हुए मुनि के मुख से वेदार्थ का परिज्ञान कर के परमात्मा मे
अपने मन को समाहित कर उसने परम पद को प्राप्त कर लिया ।।"
इस पद्य में चार वाक्यों--'मुनि तपस्या कर रहे हैं (मुनिस्तपस्यति ), 'उनके
मुख से उसने वेदार्थ का परिज्ञान किया' (तद्वक्त्रात् स वेदार्थमधिगतवान्), 'उसके
बाद उसने वासुदेव, अर्थात् परब्रह्म में अपने चित्त को समाहित कर लिया'
( तदनन्तरं वासुदेवे स मनः समावेशयत् ) और 'उसके पश्चात् वह मुक्त हो गया'
(ततश्च स मुक्तोऽभूत् )-के अर्थों का प्रतिपादन एक ही वाक्य में चारो वाक्यों
का समावेश कर किया गया है। प्रथम वाक्य की समापिका क्रिया- 'तपस्यति'
को शतृप्रत्ययान्त 'तपस्यत' शब्द द्वारा, द्वितीय वाक्य की समापिका क्रिया-
'अधिगतवान्' को क्त्वा-ल्यप्-प्रत्ययान्त 'अधिगत्य' पद द्वारा और तृतीय वाक्य
की समापिका क्रिया को बहुव्रीहि ( वासुदेवे निविष्ट आत्मा = अन्तःकरणं यस्य
तथाविधः-तत्पुरुषगर्भबहुव्रीहि ) समास द्वारा प्रथम तीन वाक्यार्थो को उद्देश्य
( के विशेषण ) और अन्तिम वाक्य के तिङन्तघटित होने से उसके अर्थ को विधेय
बनाकर चार वाक्यों के स्थान में एक ही वाक्य द्वारा अर्थ का प्रतिपादन कर
दिया गया है ।
विशेषण के साभिप्राय होने का अर्थ उसका विवक्षित अर्थ का परिपोषक
होना है। ऐसे ही विशेषण को 'हेतुगर्भ विशेषण' कहते । इसका एक उदाहरण
देखिए—