रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२२ रसगङ्गाधरः
खण्डितानेत्रकञ्जालीमञ्जुरञ्जनपण्डिताः ।
मण्डिताखिलदिक्प्रान्ताश्चण्डांशोर्भान्ति भानवः ॥
अत्र 'यस्याः पराङ्गनागेहात् पतिः प्रातर्गृहेऽञ्चति' इति वाक्यार्थे
खण्डितापदाभिधानम् ।
अयाचितः सुखं दत्ते याचितश्च न यच्छति ।
सर्वस्वं चापि हरते विधिरुच्छृङ्खलो नृणाम् ॥
अत्र दैवाधीनं सर्वमित्येकस्मिन्वाक्यार्थे नानावाक्यरचनात्मको व्यास-
पदवाच्यो विस्तरः ।
लक्षणाय। नायिकाया नेत्रकञ्जालिनेत्रकमलश्रेण्या रञ्जुनि रञ्जने पण्डिता निपुणा
अथ च मण्डिता अखिला दिग्भागा येस्तादृशाश्चण्डांशोः सूर्यस्य भानवो
भान्तीत्यर्थः ।
वाक्यार्थे = निरुक्तखण्डितालक्षणवाक्यार्थस्थाने खण्डितापदेनाभिधानादोजोऽर्थ-
गुणः ।
तृतीयस्योदाहरणम्—अयाचित इति । अत्त 'दत्ते', 'यच्छति' इति क्रिया-
द्वयान्वयाय तृणामित्यत्र चतुर्थ्या विपरिणामः कर्त्तव्यः । यद्वा सम्प्रदानत्वाऽविवक्षया
सम्बन्धसामान्ये षष्ठ्यर्थेव निर्वाहः, 'कस्याद्य किं दीयताम्' 'किं दीयताम-
विकलक्षितिदायिनस्ते' इत्यादिवत् ।
"सूर्य के वे प्रकाश चमक रहे हैं जो 'खण्डिता' नायिका के नेत्र-कमलों के
पूर्ण रंजन में निपुण हैं और दिग्-दिगन्तों को मण्डित करने वाले हैं !!"
इस पद्य में "जिसका पति परकीया नायिका के साथ रात बिता कर प्रातः
काल में उसके पास लौट आता (वह नायिका 'खण्डिता' कहलाती)" इस
सम्पूर्ण वाक्यार्थ का एक ही 'खण्डिता' पद से अभिधान किया गया है ।
अब तृतीय प्रकार के ओज का; जिसमें एक वाक्य के अर्थ का अनेक वाक्यों
द्वारा विच्छित्तिपूर्ण रीति से प्रतिपादन किया जाता है, उदाहरण लीजिए—
"मनुष्यों का भाग्य कितना उच्छृंखल-अव्यवस्थित होता कि वह बिना मांगे
सुख देता पर मांगने पर सुख भी न देता और सारा सर्वस्व भी हर लेता है !"
इस पद्य में तीन वाक्यों द्वारा 'सब कुछ भाग्याधीन है' इस एक वाक्यार्थ का
प्रतिपादन किया गया है । यही वामन के शब्द में 'व्यास-,' अर्थात् शब्द-विस्तर
कहा गया है ।
अब अनेक वाक्यों के अर्थों के एक वाक्य द्वारा प्रतिपादन का उदाहरण
प्रस्तुत है—