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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 253

प्रथमाननम् २२१
परमपुरुषवक्त्रादुद्गतानां नराणां
मधुमधुरगिरां च प्रादुरासीद्विनोदः ॥
अत्रोषसीत्येकपदार्थस्याभिधानाय प्रथमचरण इत्याद्यग्रेऽपि बोध्यम् ।
पदार्थे वाक्यरचनाया उदाहरणम्—सरसिजेत्यादि । कमलवनस्य बन्धोः सूर्यस्य
श्रियः समारम्भकाले अथ च रजनिरमणस्य चन्द्रस्य राज्ये आशु शीघ्रं तत्क्षणं वा
नाशं प्रयाति सति—इत्यर्थकस्य पूर्वार्धस्य उषसीत्यर्थः, अयं च एकेनैव उषसीति
पदेनाभिधातुं योग्योऽपि पूर्वार्द्धरूपेण वाक्येन प्रतिपादितः । एवमेव परमपुरुषस्य
महेश्वरस्य मुखादुद्गतानां नराणामिति वाक्यं ब्राह्मणानामित्येकपदार्थे प्रयुक्तम् । परम-
पुरुषवक्त्रादुद्गतानामित्यन्वेति मधुमधुरगिरामित्यत्रापि । तथा चास्य पदसमूहस्य
वेदानामित्यर्थः पर्यवस्यति । उषसि ब्राह्मणानां वेदानां च विनोदः क्रमेण पाठकत्तृ-
त्वात् पाठकर्मत्वाच्च प्रादुरासीदिति भावः । वाक्यं चात्र पदसमूहमात्रं विवक्षितं न
त्वाकांक्षादिमत्पदसमूहो निराकांक्षार्थप्रतिपादक एव । अत एव ग्रन्थकृता 'बहुभिः
पदैरभिधानम्' इत्युक्तम् । तथा च पदसमूहमात्रं वा स्यादाकांक्षादिमत्पदसमूहो वेत्यत्र
नाग्रहः । यथोदाहरणं व्यवस्था ।
प्रथमचरण इत्यत्र बहुव्रीहिः, तथा च प्रथमो भागः पूर्वार्द्धरूप इत्यर्थः । यद्यपि
प्रथमचरणेन द्वितीयेन वा विवक्षितार्थप्रतिपादनं शक्यसम्भवम् तथापि पुनरुक्ति-
वारणाय बहुव्रीहिः स्वीकृत इति बोध्यम् ।
द्वितीयस्योदाहरणमाह—खण्डितेत्यादि । खण्डिताया अनुपदं वक्ष्यमाण-
एक पद से प्रतिपाद्य अर्थ के पद-समूह द्वारा प्रतिपादन का उदाहरण यह है—
! "जिस समय कमल-कुल के मित्र (सूर्य) की छटा का उदय हो रहा था और
निशानाथ चन्द्रमा के राज्य का शीघ्रता से अन्त हो रहा था ( पूर्वार्द्ध का अर्थ )
उस समय परमपुरुष भगवान् के मुख से उत्पन्न मानवों में और उसी भगवान् के
मुख से आविर्भूत मधुसदृश मधुर वाणी का उल्लास हुआ ॥"
इस पद्य में प्रथम और द्वितीय चरणों के पद-समूह से उस उषःकाल का
प्रतिपादन, वैचित्र्य के साथ, किया गया है जिसका अभिधान एक हीं 'उषसि' पद से
हो सकता था । इसी प्रकार एक 'ब्राह्मण' पद द्वारा जिस अर्थ का अभिधान किया
जा सकता था, उसके लिए सम्पूर्ण तृतीय-चरणरूप पद-समूह का और केवल
'वेद' पद के अभिधेय अर्थ के लिए 'परमपुरुषवक्त्रादुद्गतानां मधुमधुरगिराम्' इस
पद-समूह का प्रयोग किया गया है । अतः इसमें प्रथम प्रकार का ओज है ।
एक पद द्वारा वाक्यार्थ के अभिधान का उदाहरण देखिए—