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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 249

प्रथमाननम् २१७
अकाण्डे शोकदायित्वाभावरूपमपारुष्यं सुकुमारता ॥
यथा—‘त्वरया याति पान्थोऽयं प्रियाविरहकातरः’।
‘प्रियामरणकातरः’ इत्यत्र शोकदायिनो मरणशब्दस्य सत्त्वात्पारुष्यम् ।
इदं चाश्लीलतादोषव्याप्यम् ।
वस्तुनो वर्णनीयस्यासाधारणक्रियारूपयोर्वर्णनमर्थव्यक्तिः ॥
यातीत्यस्य गृहमिति शेषः । अत्र पारुष्याभावमुपपादयति—प्रियामरणे-
त्यादिना । एतेनेदं सूच्यते यन्मृतप्रियस्य पान्थस्यैव प्रियाविरहकातर इति वर्णने
सुकुमारता । यस्य पुनर्देशान्तरगतस्य प्रिया गृहे जीवत्येव तस्यैतादृशवर्णने न
सौकुमार्यम् इति । पारुष्यं दोष इत्यपि लक्षणेन सूच्यत एव; परन्त्वयं दोषो न पृथक्
परिगणित इति कथमत्र दोषत्वेनाभिधानं तस्येत्याशङ्कां समाधत्ते-इदं चेत्यादिना ।
अमङ्गलसूचकत्वादिति भावः । कस्यचिद् व्याप्यदोषस्य पृथक् परिगणनं कस्यचिच्च
नेति विषये सम्प्रदाय एव शरणम् ।
क्रियारूपयोरिति । क्रिया च रूपं स्वरूपं च, तयोरित्यर्थः । असाधारण-
वैदग्ध्य आ जाता है ।
प्रतिपाद्य अर्थ में पारुष्य—कठोरता, जिसका अर्थ अनवसर में शोक देना है,
के अभाव को हीं 'सुकुमारता' कहते ।
जैसे—
“यह पथिक अपनी प्रियतमा के विरह (=मरण) से अत्यन्त खिन्न होकर
शीघ्रता से अपने घर को लौट रहा है ।”
इसी वक्तव्य में यदि मरणस्वरूप अर्थ के प्रतिपादन के लिए ‘प्रियामरणकातरः’
कहा जाता तो यह अनवर में हीं शोकप्रद होता, क्योंकि घर लौटने के समय उस
पथिक की प्रियतमा के मरण की बात सुनकर सहृदयों को शोक होता । यद्यपि
जिस व्यक्ति को ऐसी कठोर बात कही जाती उसे भी शोक हो हीं सकता है तथापि
काव्य में सहृदयगत शोक हीं विवक्षित होता । अतः उक्त लक्षण में निर्दिष्ट शोक को
सहृदयनिष्ठ शोक समझना चाहिए । इस लक्षण से यह स्पष्ट है कि यह अर्थगत
कठोरता—पारुष्य, जिसके अभाव को ‘सुकुमारता’ कहा गया है, एक अर्थगत दोष
है । इसे स्वतन्त्र दोष के रूप में नहीं माना गया है अपितु यह ‘अश्लीलता’ दोष
के अन्तर्गत आता, जिसमें व्रीड़ा (= लज्जातिशय), जुगुप्सा अथवा अमङ्गल की
प्रतीति होती । ‘अश्लीलता’ दोष के अन्तर्गत पूर्वोक्त मरण-शब्द से प्रतिपादित अर्थ
में अमङ्गलसूचकतास्वरूप ‘अश्लीलता’ है ।
वर्णनीय वस्तु के असाधारण स्वरूप और असाधारण क्रिया का वर्णन करना
हीं ‘अर्थव्यक्ति’ है । असाधारण का अर्थ वैदग्ध्यपूर्ण है । ऐसा प्रतीत होता कि 'अर्थ-