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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 414 में से

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पृष्ठ 248

२१६ रसगङ्गाधरः
यथा—
विधत्तां निःशङ्क निरवधिसमाधि विधिरहो
सुखं शेषे शेतां हरिरविरतं नृत्यतु हरः ।
कृतं प्रायश्चित्तैरलमथ तपोदानयजनैः
सवित्री कामानां यदि जगति जागर्ति भवती ॥
अत्र विध्यादिभिर्नास्ति किमपि प्रयोजनमित्येषोऽर्थः समाधिविधानादि-
प्रेरणारूपेणोक्तिवैचित्र्येणाभिहितः । अन्यथाऽनवीकृतत्वापत्तेः ।
नार्थोऽत्राभिप्रेतो व्युत्पत्तिभेदेन लक्षणया वा ।
विधत्तामित्यादि पद्यं गङ्गालहर्याम् । सवित्रीति तृजन्तं पदम्, कामानामिति
षष्ट्यन्तपदात् । तृजन्तत्वे तु द्वितीया स्यात्, न लोकाव्ययेति कर्मषष्ठ्या निषेधात् ।
उत्कर्षः पुनस्तृन्नन्तप्रयोगे स्यात् । भवती=गङ्गा । पदार्थः स्फुटः ।
प्रेरणात्र लिङर्थः, अभीष्टं वा । अन्यथा=उक्तिवैचित्र्याभावे । अनवीकृतत्व-
मर्थदोषो विच्छित्यनाधायकत्वात्सहृदयोद्वे जकत्वाच्च ।
अकाण्डे=अनवसरे । मार्गे विवक्षितदेशप्राप्तेरुद्देश्यत्वे नावसर इति शोकस्या-
नवसरता । एतच्च बोध्यगतत्वे शोकस्य कथञ्चित् संगच्छते । सहृदयगतत्वं तु शोकस्य
विवक्षितमिति मन्यामहे । उदाहरणानुरोधेन चाकाण्ड इत्यस्य तात्पर्यमस्फुटम् ।
'अपारुष्यं सौकुमार्यम्' इति वामनोक्त लक्षणमेवात्र परिष्कृतम् । सुकुमारतायाः
पारुष्याभावस्वरूपत्वेनैव दोषाभावात्मकत्वमुपपादयन्त्यन्ये ।
अर्थ का भिन्न-भिन्न भङ्गी (अभिव्यक्ति-प्रकार) से प्रतिपादन करना है ।
उदाहरण गङ्गालहरी के निम्नलिखित पद्य में द्रष्टव्य है—
“मां गङ्गे ! सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाली तू जब इस संसार में सजग
है तब विधाता निश्चिन्त होकर अनन्त समाधि में निमग्न हो जांय, भगवान् विष्णु
शेषनाग के ऊपर आराम से शयन के लिए चले जांय, भगवान् शिव सर्वदा अपने
ताण्डव में संलग्न हो जांय, पापक्षय के निमित्त विभिन्न प्रायश्चित्त करने की भी
कोई आवश्यकता नहीं और इसके लिये तप, दान और पूजन आदि शास्त्र-विहित
कर्म का भी कोई उपयोग नहीं ।”
इस पद्य में प्रतिपादनीय अर्थ यही है कि जब गङ्गा सकल पाप-ताप को दूर
करने के लिए सन्नद्ध है तो फिर विधाता आदि का कोई प्रयोजन नहीं । परन्तु यदि
इसी रूप में यह अर्थ शब्दों द्वारा प्रतिपादित होता तो इसमें चमत्कार न होने से यहां
'अनवीकृतत्व' दोष आ जाता । अत एव विधाता आदि को अनन्त समाधि में
निमग्न हो जाने आदि की प्रेरणा का प्रतिपादन किया गया है जिससे अर्थ में एक