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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 247, कुल 414 में से

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पृष्ठ 247

प्रथमाननम् २१५
यथा—
हरिः पिता हरिर्माता हरिर्भ्राता हरिः सुहृत् ।
हरिं सर्वत्र पश्यामि हरेरन्यन्न भाति मे ॥
अत्र विष्णुर्भ्रातेत्यादिनिर्माणे प्रक्रमभङ्गात्मकं वैषम्यम् ।
एकस्या एवोक्तेर्भङ्ग्यन्तरेण पुनः कथनात्मकमुक्तिवैचित्र्यं
माधुर्यम् ।
धानार्थत्वादस्यान्यत्रापि तथा । यदि तु एकपदप्रयोगे न विच्छित्तिस्तदा परिहरणीय
एव सः ।
हरिरित्यादिपद्ये हरिशब्देनैवोपक्रमादुपसंहारपर्यन्तं परमेश्वररूपार्थस्याभिधीय-
मानत्वं स्पष्टमेव । पर्यायशब्दानां परस्परं भिन्नत्वं नार्थभिन्नत्वे कारणमिति यद्यप्या-
पाततः प्रतीयते तथापि शब्दस्यापि शाब्दबोधे भानस्य वैयाकरणादिसम्मतत्वेन
एकशब्देनार्थबोधे एकरूपेणार्थः प्रतीयते शब्दान्तरेण पुनर्बोधे तच्छब्दविशिष्टः प्रतीयत
इति विशेषणभेदादर्थभेदोऽर्थवैषम्यरूप इति मर्मप्रकाशः । अत्रोदाहृतमिदं पद्यं कीदृशं
काव्यमिति विवेचनीयम् ।
वामनोक्तं माधुर्यलक्षणं परिष्कृत्याह—एकस्या इत्यादिना । उक्तिशब्दे-
हो उसी शब्द से अन्त तक उसका प्रतिपादित होना ( प्रारम्भ में एक शब्द से ओर
बाद में अन्य शब्द से प्रतिपादित न होना ) 'समता' है ।
जैसे—
“हरि हीं मेरे पिता हैं, हरि हीं माता हैं, हरि हीं मित्र हैं, मैं सर्वत्र हरि को
हीं देखता, मुझे हरि से अतिरिक्त कुछ भी नहीं दिखायी देता ॥”
इस पद्य में उपक्रम से उपसंहार तक परमेश्वर-स्वरूप अर्थ का एक 'हरि' शब्द
से हीं प्रतिपाद होने से इसमें 'समता' नामक गुण है । इसके विपरीत,
हरिः पिता हरिर्माता विष्णुर्भ्राता हरिः सुहृत् ।
विष्णुं सर्वत्र पश्यामि विष्णोरन्यन्न भाति मे ॥
इत्यादि प्रकार से यदि भिन्न-भिन्न शब्दों द्वारा परमेश्वर-स्वरूप अर्थ का अभिधान
किया गया होता तो 'समता' न होती । इसका कारण यह है कि शाब्दबोध के
सविकल्पक होने—विशेषणविशिष्ट विशेष्य का ज्ञान होने—से विशेषणीभूत शब्द में
भी शाब्दबोध-विषयता होती । ऐसी स्थिति में भिन्न-भिन्न शब्दों से एक हीं
अर्थ का प्रतिपादन करने पर तत्तच्छब्दजन्य बोध में तत्तत् शब्द (नाम) की प्रतीति
होने से सभी खण्डवाक्यों से होने वाले बोध में एकरूपता हो नहीं सकती । अत
एव ऐसी दशा में प्रक्रमभङ्गदोष आ जाने से 'समता' विघटित हो जाती है ।
उक्तिवैचित्र्य को 'माधुर्य' कहा जाता । उक्तिवैचित्र्य का अभिप्राय एक हीं