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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 246, कुल 414 में से

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पृष्ठ 246

२१४ रसगङ्गाधरः
यावदर्थकपदत्वरूपमर्थवैमल्यं प्रसादः ॥
यथा--'कमलानुकारि वदनं किल तस्याः' इत्यादि । प्रत्युदाहरणं तु
'कमलकान्त्यनुकारि वक्त्रम्' इत्यादि ।
प्रक्रमाऽभङ्गे नार्थघटनात्मकमवैषम्यं समता ॥
यावदर्थकेत्यादि । यावन्तोऽर्थाः प्रतिपिपादयिषिताः तावतामेव शब्दानां न
न्यूनानां नाप्यधिकानां प्रयोगो यत्र तत्त्वं प्रसाद इत्यर्थः । अर्थेऽन्यूनानतिरिक्तपद-
प्रतिपाद्यत्वं प्रसादोऽर्थगुण इति तात्पर्यम् । इदं च 'अर्थवैमल्यं प्रसादः' इति
वामनोक्तलक्षणस्यैव स्फुटतरं वचनम् ।
कमलकान्तीत्यत्र प्रत्युदाहरणे कान्तिपदमधिकमित्याशयः । वामनेन तु अर्थपुन-
रुक्तावपि प्रत्युदाहरणत्वमङ्गीकृतम् । प्रकृतेऽपि तद् बोध्यम् । तादृशं प्रत्युदाहरणं
च वामनादिग्रन्थेष्वप्योऽविगन्तव्यम् । परन्तु भङ्ग्यन्तरेणार्थस्य पुनरुक्तिर्गुण एव, न
दोष इति कविसम्प्रदायः । वक्ष्यते चैवं माधुर्यं लक्षयता ग्रन्थकृता !
प्रक्रमाऽभङ्गेनेति । येन शब्देनार्थस्याभिधानमारम्भे तेनैव समाप्तिपर्यन्त-
मभिधानम्--समानशब्देनैवोपक्रमप्रभृत्युपसंहारपर्यन्तं प्रतिपाद्यमानत्वमर्थस्य समतेति
भावः । उद्देश्यस्यैक्येऽभिन्नेनैव पदेनोपादानं तस्य विशेषेणापेक्ष्यते, विच्छित्त्या-
एक को धोखा देकर दूसरी को चूमना विदग्धचेष्टित है, यह विदग्धचेष्टित
जिसकी आँखें बन्द हैं उसके लिए अव्यक्त भी है और पीछे से आकर एक की
आँखें बन्द कर देना इस विदग्धचेष्टित का उपपादक है । इस प्रकार एक ही पद्य में
चुम्बन-क्रिया द्वारा विदग्धचेष्टित का, खेल करने का बहाना करने की क्रिया द्वारा
उस विदग्धचेष्टित की एक नायिका के लिए अव्यक्तता का और पीछे से आकर
आँखें बन्द कर देने की क्रिया से उस विदग्धचेष्टित चुम्बन का उपपादन किये जाने
से यहाँ पूर्वलक्षित 'श्लेष' गुण की स्थिति स्पष्ट है ।
अर्थ की विमलता--स्पष्टता, अर्थात् प्रतिपाद्य अर्थ का प्रतिपादन करने
के लिए जितने शब्द आवश्यक हों उतने ही शब्दों द्वारा, उनसे कम या अधिक
शब्दों द्वारा नहीं, अर्थ-प्रतिपादन किया जाना 'प्रसाद' नामक अर्थगुण कहलाता ।
जैसे--'उस नायिका का मुख कमल का अनुकरण करने वाला, अर्थात् कमल-
सदृश मनोहर है" इस वाक्य द्वारा वर्णित अर्थ में 'प्रसाद' गुण है । इसके विपरीत,
'उस नायिका का मुख कमल की कान्ति का अनुकरण करने वाला है" इस वाक्य
में वर्णित अर्थ में 'प्रसाद' गुण नहीं है, क्योंकि इस वाक्य में विवक्षित अर्थ के
प्रतिपादन के लिए आवश्यक शब्दों से अधिक 'कान्ति' शब्द प्रयुक्त है ।
विवक्षित एक अर्थ का जिस शब्द से वर्णन के प्रारम्भ में प्रतिपादन किया गया