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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 245

प्रथमाननम् २१३
प्रबन्धघटके निवेशः । प्रबन्धे प्रायेण सर्वत्र, मुक्तके तु क्वचिदेवाय गुणः ।
अस्योदाहरणं पण्डितराजग्रन्थे न दृश्यते । कथञ्चित् परिभ्रष्टमिति प्रतीयते ।
अतो वामनोक्तमुदाहरणं द्रष्टव्यम्—
दृष्ट्वैकासनसंस्थिते प्रियतमे पश्चादुपैत्यादराद्
एकस्या नयने पिधाय विहितक्रीडानुबन्धच्छलः ।
ईषद्वक्रितकन्धरः सपुलकः प्रेमोल्लसन्मानसाम्
अन्तर्हासिलसत्कपोलफलकां धूर्त्तोऽपरां चुम्बति ॥
अस्यार्थः—एकस्मिन्नेवासन उपविष्टे प्रियतमे ( द्वितीयाद्विवचने रूपम् ) दृष्ट्वा
धूर्त्तो नायकः पश्चात् पृष्ठदेशत आदरादतर्कितालिङ्गनकौतुकादस्या नायिकायाः
क्रीडानुबन्धच्छलेन नयने पिधाय मनाङ्नमितग्रीवः सरोमोद्गमश्च सन् प्रेमोल्ल-
सन्मानसां रहस्यसंगोपनेच्छया विहितेनान्तर्हासिनोत्फुल्लकपोलफलकां चापरां
नायिकां चुम्बतीति । उभयोर्नायिकयोः प्रियतमेतिनिर्देशात्प्रथमाया अपि चुम्बनादिकं
तेन क्रियत एव । सपुलक इत्युक्त्या पुनर्द्वितीयास्यामनुरागातिशयो द्योत्यते ।
अत्र चैकस्या वञ्चनेनापरस्याश्चुम्बनं विदग्धचेष्टितम्, एकयाऽपरचुम्बनस्याज्ञात-
त्वात्तदस्फुटत्वम्, क्रीडानुबन्धच्छलेन च प्रथमनायिकानयनपिधानादपरस्याश्चुम्बन-
स्योपपादनम् इत्येतत्सर्वं तदनुकूलक्रियापरम्परया पश्चादागमनादिरूपया समान एव
पद्ये ग्रथितमिति श्लेषोऽत्रार्थगुण इति समन्वयप्रकारः ।
धिकरणसम्बन्ध, अर्थात् किसी एक काव्यवाक्य या महावाक्य में वर्णन होना हीं
'श्लेष' नामक अर्थगुण है ।
यह अर्थगुण इसीलिए माना जाता कि उक्त सामानाधिकरण्य चेष्टा आदि
अर्थों का हीं विवक्षित है, तद्वाचक शब्दों का नहीं ।
इसका उदाहरण रसगङ्गाधर में उपलब्ध नहीं है । अतः वामन द्वारा उद्धृत
अमरुक कवि के 'दृष्टैकासनसंस्थिते' इत्यादि पद्य में ही इसका उदाहरण द्रष्टव्य
है । पद्य संस्कृत-टीका में उद्धृत है, इसका अर्थ निम्नलिखित है—
“जब धूर्त नायक ने देखा कि उसकी दोनों ही प्रियतमाएं एक हीं जगह बैठी
हुई हैं और उस स्थिति में उन दोनों में अनुकूलतर प्रियतमा को चूमना उसके लिए
सम्भव नहीं, क्योंकि वैसा करने पर एक प्रियतमा नाराज हो जाएगी तब उसने
उत्कण्ठापूर्वक पीछे जाकर खेल के बहाने उस एक प्रियतमा की आँखें बन्द कर
दीं । फिर धीरे से अपनी गर्दन को कुछ टेढ़ी करके प्रेम से उल्लसित होती हुई
और 'अन्य प्रियतमा कहीं यह रहस्य समझ न ले'—इस भय से भीतर हीं भीतर
हँसने के कारण फूले हुए गालों वाली दूसरी प्रियतमा को रोमाञ्चित होकर उस
( धूर्त्त नायक ) ने चूम लिया ।”