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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 414 में से

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पृष्ठ 241

प्रथमाननम् २०९
संयोगपरह्रस्वप्राचुर्यरूपं गाढत्वमोजः ॥
यथा—
साहङ्कारसुरासुरावलिकराकृष्टभ्रमन्मन्दर-
क्षुभ्यत्क्षीरधिवल्गुवीचिवलयश्रीगर्वसर्वंकषाः ।
तृष्णाताम्यदमन्दतापसकुलैः सानन्दमालोकिता
भूमीभूषण भूषयन्ति भुवनाभोगं भवत्कीर्तयः ॥
यथा वा 'अयं पततु निर्दयं' इत्यादिप्रागुदाहृते ।
संयोगेत्यादि । संयोगश्चात्र परसवर्णनिष्पन्नहल्भिन्नहल्घटितो ग्राह्यः । अत्र
'संयोगश्च परसवर्णनिष्पन्नो ग्राह्यः' इति व्याचक्षाणा रसचन्द्रिका चिन्त्या । एवमेव
माधुर्यव्याख्यानान्तर्गताऽपि । इयं हि व्याख्या मर्मप्रकाशस्यपाठभ्रंशमूलिकैवेति
प्रागावेदितम् । प्राचुर्यं चैकाधिकत्वमतो द्विःप्रयोगेऽपि तत्त्वमक्षतम् ।
साहङ्कारेत्यादि । हे भूमीभूषण वसुधालङ्कारभूत राजन् ? साहङ्कारा या
सुराणामसुराणाञ्चावलिस्तस्याः करैराकृष्टत्वादभ्रमता मन्दरेण क्षुभ्यतः क्षीरब्धेः
समुद्रस्य वीचिवलयानां श्रिय उज्ज्वलताया गर्वस्य सर्वंकषाः पूर्णतयाऽपहारिकाः,
अथ च तृष्णया ताम्यद्भिराकुलैरमन्दानां तापसानां कुलैः सानन्दं सुधास दृश्यादा-
लोकिता भवतः कीर्तयो भुवनस्य आभोगं विस्तारं भूषयन्ति । कस्यचिद्राज्ञः स्तुति-
रियम् । ‘भूमी’ इति ‘कृदिकारादक्तिनः’ इति विकल्पेन ङीप्प्रत्यये रूपम् ।
शब्दशक्तिमूलध्वनिप्रसङ्गे विशेषोऽत्र वक्ष्यते । अयं पतत्वित्यादि । नवोच्छलि-
नहीं है । इसके अतिरिक्त यह भी सत्य है कि सहृदयों को 'विनिविष्टैर्नूपुरैर्नृत्तं'
इस अंश में भी नृत्यत्प्रायता का अनुभव नहीं होता, 'स्वचरण' आदि अंशों में तो
नृत्यत्प्रायता के विपरीत 'माधुर्य' का ही अनुभव होता । अतः न तो उदाहरण हीं
उपयुक्त है और न उपर्युक्त व्याख्या हीं ।
परसवर्ण-निष्पन्न व्यञ्जन से भिन्न व्यञ्जनों से घटित संयोगों से पूर्ववर्त्ती
ह्रस्व स्वर की रचनागत प्रचुरता को हीं 'ओज' कहते ।
उदाहरणार्थ 'साहङ्कार०' आदि पद्य द्रष्टव्य है—"हे महाराज ! अहङ्कारपूर्ण
देव-दानवों के समूह द्वारा आकृष्ट होने से तीव्र गति से घूमते हुए मन्दराचल द्वारा
आलोडित (= उन्मथित) क्षीरसमुद्र की रम्य तरङ्गों के समूह के सौन्दर्याभिमान को
समूल विनष्ट कर देने वाली और पिपासाकुल उत्तम तपस्वियों द्वारा स्वच्छ सुधा
के भ्रम से आनन्दपूर्वक देखी जाने वाली आपकी उज्ज्वल कीर्तिराशि समस्त ब्रह्माण्ड
को प्रकाशित कर रही है ।"
इसका दूसरा उदाहरण रौद्ररस के उदाहरण के रूप में पूर्वनिर्दिष्ट (नवोच्छ-