सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 414 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 240

२०८ रसगङ्गाधरः

सीत्' इत्यादि। तत्र तेषामेतादृश्यां विकटत्वलक्षणायामुदारतामोजस्यन्तर्भा-
वयन् काव्यप्रकाशकारः कथमनुकूल इति त एव जानन्ति। न ह्यत्रौजसो
वैपुल्येन प्रतिभानमस्ति। 'विनिविष्टैर्नूपुरैर्नर्तं'—इत्यत्र सन्नप्योजसो
लवो न चमत्कारी। नापि तत्र नृत्यत्प्रायत्वं वर्णानामनुभवन्ति सहृदयाः।
अंशान्तरे तु माधुर्यमेव।


विकटतालक्षणायामुदारतायाम्। एतादृशीमित्यपपाठः, तैर्वणिताया उदारतायाः
काव्यप्रकाशकारेणौजस्यन्तर्भावाऽकरणात्तथाविधाया अन्तर्भावक्रियाकर्मत्वानुपपत्तेः।
अथवा एतादृशामिति पठनीयम्। यद्वा शब्दगुणत्वेनाभिमतामित्यर्थं कृत्वा कथञ्चिद्
द्वितीयान्तपाठस्यापि सङ्गतिः कर्त्तव्या। कथमनुकूल इति। ओजःपर्याय-
भूतत्वाद्विकटताया ओजसि च पदानां नृत्यत्प्रायत्वस्य सर्वत्राभावात्तदभिन्ना विकटता
न तादृशी मन्तुं शक्यते मम्मटेनेत्यर्थः। तथा चैते टीकाकारा मूलविरुद्धा एवेति
नादरणीयाः। ननु ओजस्यन्तर्भावो विकटतालक्षणोदारताया न तदभिन्नतयाऽपि
तु तद्विशेषतयैवेत्यतः खण्डनयुक्त्यन्तरमाह—न वैपुल्येनेति। स्वचरणेत्यत्र
झणिति रणितमासीदित्यादौ चौजसोऽभावादिति भावः। लव इत्युक्तिरोजसोंऽशाव-
स्थितिमभिप्रेत्य। न चमत्कारीति। प्रकृतरसानुकूलत्वमत्र हेतुः। अंशान्तरे=
स्वचरणेत्यादौ।


कहते। इसका उदाहरण उन्होंने निम्नलिखित पद्यार्ध को दिया है—
स्वचरणविनिविष्टैर्नूपुरैर्नर्तंकीनां
झणिति रणितमासीत्तत्र चित्रं कलञ्च॥
किन्तु विकटतास्वरूप उदारता का ओजोगुण में अन्तर्भाव करने वाले काव्य-
प्रकाशकार का नृत्यत्प्रायतास्वरूप विकटता कैसे अभिमत हो सकती है? कारण
यह है कि काव्यप्रकाशकार इस विकटतास्वरूप उदारता को ओजोगुण से अभिन्न
मानते; ओजोगुण में सर्वत्र पदों की नृत्यत्प्रायता नहीं देखी जाती, अतः ओज से
अभिन्न विकटता में भी सर्वत्र नृत्यत्प्रायता न होने से उपर्युक्त व्याख्या मूलानुकूल
नहीं है, अतः उपेक्षणीय है। यदि तु उक्त अन्तर्भाव का उपपादन विकटता को
ओजोगुण से अभिन्न नहीं अपितु उसका एक विशेष प्रकार मानकर किया जाय
(यही उचित भी है) तो भी उक्त व्याख्या संगत नहीं है, क्योंकि उनके द्वारा प्रस्तुत
उदाहरण में भी सभी पदों में नृत्यत्प्रायता तो है नहीं। हां, 'विनिविष्टैर्नूपुरैर्नर्तं'
इस अंशमात्र में नृत्यत्प्रायता का प्रतिभास होता। किन्तु इस नृत्यत्प्रायतास्वरूप
ओज को (काव्यप्रकाशकार के मतानुसार) चमत्कारजनक न होने से गुण कहना
कहां तक संगत है—यह विचारणीय है। इसके चमत्कारजनक न होने का कारण यही
है कि उदाहरण में वीर आदि रसों की अभिव्यक्ति न होने से यह ओज रसानुकूल