रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् १९१
प्रभृतय एव न राजादयः, जात्योत्तमैर्द्विजैरेव नाधमैः शूद्रादिभिः,
परमेश्वरेत्यादिसंबोधनैश्चक्रवर्तिन एव न मुनिप्रभृतयः संबोद्ध्याः ।
तथा चाहुः —
अनौचित्यादृते नान्यद्रसभङ्गस्य कारणम् ।
प्रसिद्धौचित्यबन्धस्तु रसस्योपनिषत्परा ॥
यावता त्वनौचित्येन रसस्य पुष्टिस्तावत्तु न वार्यते, रसप्रतिकूलस्यैव तस्य
निषेध्यत्वात् । अत एव --
व्यवहर्त्रनौचित्यं प्रतिपादयति — जात्येत्यादिना ।
उक्तार्थे ध्वन्यालोकवृत्तिस्थं वचनं प्रमाणत्वेन निर्दिशति — तथा चाहुरिति ।
परोपनिषत् = उत्कृष्टोपनिषदिव रसतत्त्वाभिव्यञ्जकः प्रसिद्धौचित्यबन्ध इत्यर्थः ।
सर्वलोकस्वतन्त्रं रावणं स्तोतुं तस्य द्वारि समवेतान् ब्रह्मादीन् प्रति दौवारि-
व्यक्तियों के प्रति अत्यादरसूचक वचन का प्रयोग नहीं करवाना चाहिए । इसके
विपरीत हीन व्यक्तियों द्वारा उत्कृष्ट व्यक्तियों के प्रति उस प्रकार के वचन का
प्रयोग, औचित्यनिर्वाहार्थ, कवि को अवश्य करवाना चाहिए । अत्यादरसूचक वचन
के प्रयोग के विषय में भी यह ज्ञातव्य है कि 'तत्र भवन्', 'भगवन्' इत्यादि शब्दों
से मुनि,गुरु, देवता आदि श्रेष्ठ व्यक्तियों का ही सम्बोधन उचित है, राजा आदि का
नहीं । मुनि आदि का उपर्युक्त शब्दों से सम्बोधन उत्तमजातीय द्विजों द्वारा हीं
उचित है, अधमजातीय शूद्र आदि द्वारा नहीं । इसी तरह, 'परमेश्वर'
'महाराज' आदि शब्दों से चक्रवर्त्ती राजाओं का सम्बोधन हीं उचित है, मुनि आदि
का नहीं ।
अत एव आचार्य आनन्दवर्धन ने कहा है —
“रस-भङ्ग का कारण अनौचित्य को छोड़कर ओर कुछ नहीं है । अपनी
कृतियों में प्रमाणसिद्ध औचित्य का निर्वाह रस-तत्त्व की अभिव्यक्ति का सर्वोत्कृष्ट
प्रकार है ।”
किन्तु साधारणतः अनौचित्य के परिहार्य होने पर भी जो अनौचित्य सम्बद्ध
रस का परिपोषक हो उसका उपनिबन्ध कवि को करना हीं चाहिए, क्योंकि
रसपरिपाक हीं कवि का मुख्य लक्ष्य होता । अत एव यह स्पष्ट है कि
परिहरणीय अनौचित्य का तात्पर्य उस अनौचित्य से है जो रस-परिपाक का
विरोधी हो ।
इसी लिये —