रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 222, कुल 414 में से
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१९० रसगङ्गाधरः
रसानुल्लासापत्तेः। न च साधारणीकरणादाराध्यत्वज्ञानानुत्पत्तिरिति
वाच्यम्। यत्र सहृदयानां रसोद्बोधः प्रमाणसिद्धस्तत्रैव साधारणीकरणस्य
कल्पनात्। अन्यथा स्वमातृविषयकस्वपितृरतिवर्णनेऽपि सहृदयस्य
रसोद्बोधापत्तेः। जयदेवादिभिस्तु गीतगोविन्दादिप्रबन्धेषु सकलसहृदय-
संमतोऽयं समयो मदोन्मत्तमतङ्ग Jerिव भिन्न इति न तन्निदर्शनेनेदानीं-
तनेन तथा वर्णयितुं सांप्रतम्। विद्यावयोवर्णाश्रमत्तपोभिरुत्कृष्टैः
स्वतोऽपकृष्टेषु न सबहुमानेन वचसा व्यवहर्तव्यम्। व्यवहर्तव्यं चाप-
कृष्टैरूत्कृष्टेषु। तत्रापि तत्रभवन्भगवन्नित्यादिभिः संबोधनर्मुनिगुरुदेवता
रौद्ररसाभिव्यक्तिर्न भवतीत्यर्थो द्वितीयस्य हेतुवाक्यस्य। साधारणीकरणादिति।
भट्टनायकादिमते पूर्वोक्ते भावकव्यापारभावनाविशेषमहिम्ना साधारणीकरणाद्
यथा दुष्यन्तत्वादिकं न प्रतीयते तथैवाराध्यत्वमपि देवपत्न्यादिषु न प्रतीयेतेत्याशयः
शङ्कितुः। समयः = सिद्धान्तः। समयः सङ्केत इत्यपव्याख्यानम्। भिन्नः =
भग्नः, परित्यक्तः। व्यवहारानौचित्यमुदाहरति- तथेति। आदिपदसूचितं
प्रकृतियों में वर्णन करने पर उनमें जो लोगों का आराध्यत्व-ज्ञान होता उसके
कारण सहृदयों में दिव्यप्रकृत्यालम्बनक शृङ्गार रस की अनुभूति न हो सकेगी।
इसी तरह मानव में दिव्य प्रकृति के समान आश्चर्यजनक क्रोध के वर्णन में
उस क्रोध के मानवनिष्ठ उक्त अनुभावों में मिथ्यात्व-बोध होने से
सहृदयों को तन्मानवालम्बनक रौद्र रस की प्रतीति भी न हो सकेगी।
अतः इस प्रकार के वर्णन अनुचित हैं। भावकत्व व्यापार आदि के
कारण दुष्यन्तत्व आदि के समान आराध्यत्व के भी आच्छादित—अव्यक्त हो जाने से
रस-प्रतीति होने में उपर्युक्त आराध्यत्व-ज्ञान प्रतिबन्धक न हो सकेगा—ऐसा कहना
असंगत है, क्योंकि यदालम्बनक रसप्रतीति प्रामाणिक है तदालम्बनविषयक साधा-
रणीकरण हीं मान्य है, अन्य प्रकार का नहीं। यदि ऐसा न हो तो अपने माता-
पिता के रति-वर्णन में भी साधारणीकरण द्वारा मातृत्व पितृत्व का आच्छादन हो
जाएगा, फलतः वहाँ भी पुत्रादि सहृदयों को शृङ्गार रस की प्रतीति माननी
होगी। परन्तु यह नितान्त अनुचित एवम् अप्रामाणिक है--ऐसी सभी सहृदयों की
मान्यता है। हाँ; जयदेव आदि कुछ कवियों ने गीतगोविन्द आदि में पागल हाथी
की तरह इस मान्यता का उल्लङ्घन अवश्य किया है, किन्तु उन्हें निदर्शनं मानते
हुए ऐसा वर्णन करना अनुचित है। व्यवहारीचित्य का निर्वाह करते हुए कवि को
विद्या, वय, वर्ण, आश्रम एवम् तप से उत्कृष्ट व्यक्तियों द्वारा अपनी अपेक्षा हीनतर