सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 414 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 220

१८८ रसगङ्गाधरः
तस्य तस्य यल्लोकशास्त्रसिद्धमुचितद्रव्यगुणक्रियादि तद्भेदः । जात्यादेर-
नुचित यथा – गवादेस्तेजोबलकार्याणि पराक्रमादीनि, सिंहादेश्च साधुभावा-
दीनि । स्वर्गे जराव्याध्यादि, भूलोके सुधासेवनादि । शिशिरे जलविहारा-
दीनि, ग्रीष्मे वह्निसेवा । ब्राह्मणस्य मृगया, बाहुजस्य प्रतिग्रहः, शूद्रस्य निग-
माध्ययनम् । ब्रह्मचारिणो यतेश्च ताम्बूलचर्वणम्, दारोपसंग्रहः । बालवृद्धयोः
स्त्रीसेवनम्, यूनश्च विरागः । दरिद्राणामाढ्याचरणम्, आढ्यानां च दरिद्रा-
चारः । प्रकृतयो दिव्याः, अदिव्याः, दिव्यादिव्याश्च । धीरोदात्तधीरोद्धतधीर-
ललितधीरशान्ता उत्साहक्रोधकामिनीरतिनिर्वेदप्रधाना उत्तममध्यमाधमाश्च ।
लोकेत्यादि । लोकसिद्धं शास्त्रसिद्धं चेत्यर्थः । तद्भेदः = तद्भिन्नत्वम्, तद्विप-
र्ययः । गवादेरिति । जात्यनौचित्यस्येदमुदाहरणम् । देशानौचित्यमुदाहरति-
स्वर्ग इत्यादि । कालानौचित्यस्योदाहरणम्—शिशिर इत्यादि । वर्णानौचित्यम्—
ब्राह्मणस्येत्यादि । आश्रमा ब्रह्मचर्यादयश्चारः प्रसिद्धाः, तदनौचित्यस्यो-
दाहरणम्—ब्रह्मचारिण इत्यादि । वयोऽनौचित्यस्य निदर्शनम्—
बालेत्यादि । अवस्था दशा, तदनौचित्यमाह—दरिद्राणामित्यादि ।
प्रकृत्यनौचित्यं विशदयति—प्रकृतय इत्यादिना । प्रकृतयो नायकाः ।.
दिव्या इन्द्रादयः । अदिव्याः वत्सराजादयो मानुषरूपाः । दिव्याऽदिव्याः
मानुषरूपेणावतीर्णा देवा रामादयो दिव्यमानुषाः । एवं त्रिधा प्रकृतिः ।
एतासु प्रत्येकमुत्साहप्रधाना धीरोदात्ता, क्रोधप्रधाना धीरोद्धता, कामिनीविषयक-
लोक-सिद्ध तथा शास्त्र-सिद्ध जो जो द्रव्य, गुण, क्रिया आदि अनुकूल हैं उनसे भिन्न
का वर्णन हीं अनौचित्य है । इनमें जातिगत अनौचित्य गाय बैल आदि क्षुद्र सत्त्वों
द्वारा तेजस्विता और बल के कार्य पराक्रम आदि के ओर सिंह आदि उग्र
पशुओं द्वारा साधुता आदि के प्रदर्शन के वर्णन में स्पष्ट है । स्वर्ग में जरा एवं
रुग्णता के वर्णन में, भूलोक में अमृतपान आदि के वर्णन में देशगत अनौचित्य हैं ।
ब्राह्मण द्वारा शिकार खेलने, क्षत्रिय द्वारा दान लेने और शूद्र द्वारा वेदाध्ययन
आदि के वर्णन में जातिगत अनौचित्य है । आश्रमगत अनौचित्य ब्रह्मचारी और
सन्न्यासी द्वारा पान चबाने और विवाहादि कार्य के वर्णन में स्पष्ट है । वयोगत
अनौचित्य बालक और वृद्ध की कामिनी में आसक्ति और युवक की उससे विरक्ति के
वर्णन में है । अवस्थागत अनौचित्य है दारिद्र्यावस्था में वर्तमान व्यक्तियों
द्वारा धनियों जैसे कार्यों के सम्पादन के और धनियों द्वारा दरिद्रों जैसे आचरण के
वर्णन में । प्रकृतियाँ तीन प्रकार की होतीं-दिव्य, अदिव्य और दिव्याऽदिव्य । इनमें
से प्रत्येक के चार प्रभेद होते-धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरललित और धीरप्रशान्त । इन