रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् १८७
प्रतिपक्षस्य प्रकृतापेक्षया वर्ण्यमानोऽप्युत्कर्षः स्वाश्रयहन्तृतामात्रादेव
प्रकृतगतमुत्कर्षमयिशाययेत, अतो न दोषावह इति वाच्यम्। एवं हि
सति महाराजं कमपि विषशरक्षेपमात्रेण व्यापादितवतो वराकस्य शबर-
स्येव प्रकृतस्य नायकस्य न कोऽप्युत्कर्षः स्यादिति। तथा रसालम्बनाश्रय-
योरनुसंधानमन्तरान्तरा न चेद्दोषः। तदनुसंधानाधीना हि रसप्रतिपत्ति-
धारा तदननुसंधाने विरता स्यात्। एवं प्रकृतरसानुपकारकस्य वस्तुनो
वर्णनमपि प्रकृतरसविरामहेतुत्वादोष एव।
अनौचित्यं तु रसभङ्गहेतुत्वात्परिहरणीयम्। भङ्गश्च पानकादिरसादौ
सिकतादिनिपातजनितेवारुन्तुदता।
तच्च जातिदेशकालवर्णाश्रमवयोवस्थाप्रकृतिव्यवहारादेः प्रपञ्चजातस्य
प्रतिनायकचरितादेः। स्वाश्रयेति। स्वं प्रतिनायकोत्कर्षस्तदाश्रयः प्रतिनायक
एव। उत्कर्षाश्रयनाशकमात्रस्य नोत्कृष्टतरत्वमिति दृष्टान्तमुखेन समाधत्ते—
एवं हीत्यादिना। एतावताङ्गरसस्योपकारकस्यापि वर्णनमङ्ग्यपेक्षयोत्कृष्टतरं न
कर्त्तव्यमिति प्रतिपादितम् ! दोषान्तरम् – तथेत्यादिना। रसो ह्यत्र प्रधानी-
भूतो ग्राह्यः, तदाश्रयादेरेव प्रबन्धेऽन्तराऽन्तराननुसन्धाने वैरस्यात्। एवमित्यादिना
ऽनङ्गस्य वर्णनं दोष इत्याह।
अन्त्यं दोषमाह — अनौचित्यमिति। पूर्वोक्तानां दोषाणामनौचित्यान्तर्गत-
त्वेऽपि ब्राह्मणवसिष्ठन्यायेन पृथगुपादानं न विरुध्यते। तच्च = अनौचित्यं च।
प्रतिनायक का अधिकाधिक उत्कर्ष भी नायक के उत्कर्ष का परिपोषक हीं होगा —
यह कहना भी असंगत है, क्योंकि वैसी स्थिति में नायक का कोई उत्कर्ष उसी
प्रकार प्रतीत नहीं होगा जिस प्रकार किसी शूर महाराज को केवल एक विषाक्त
बाण के द्वारा मार गिराने वाले क्षुद्र शबर (किरात) का कोई उत्कर्ष प्रमाणित
नहीं होता। इसी तरह, मुख्य रस के आलम्बन और आश्रय का कथा के बीच-
बीच में अनुसन्धान न करना भी कवि की कृति मे एक दोष है, क्योंकि ऐसा होने
पर आलम्बनादि के अनुसन्धान से होने वाले रसास्वाद का विच्छेद हो जाता।
अनौचित्य तो रस-भङ्ग का प्रमुख कारण होने से सर्वथा त्याज्य है। रस-भङ्ग
का अर्थ अप्रियता है। जैसे किसी मृष्ट पेय पदार्थ में बालू आदि के मिल जाने से
उसके आस्वाद में अप्रियता आ जाती उसी तरह रसास्वाद में आई अप्रियता हीं
रस-भङ्ग कहलाती।
जाति, देश, काल, वर्ण, आश्रम, वय, अवस्था, प्रकृति, व्यवहार, आदि के-