रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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१८६ रसगङ्गाधरः
[Main Sanskrit Text]
नर्हेऽवसरे प्रस्तावः, विच्छेदानर्हे च विच्छेदः । यथा संध्यावन्दनदेव-
यजनादिधर्मवर्णने प्रसक्ते कयापि कामिन्या सह कस्यचित्कामुकस्यानुराग-
वर्णने । यथा च समुपस्थितेषु महाहवदुर्मदेषु प्रतिभटेषु मर्मभिन्दि वचना-
न्युद्गिरत्सु नायकस्य संध्यावन्दनादिवर्णने चेत्युभयमनुचितम् । एवम-
प्रधानस्य प्रतिनायकादेर्नानाविधानां चरितानामनेकविधायाश्च संपदो
नायकसंबन्धिभ्यस्तेभ्यो नातिशयो वर्णनीयः । तथा सति वर्णयितुमिष्टो
नायकस्योत्कर्षो न सिद्धयेत, तत्प्रयुक्तो रसपोषश्च न स्यात् । न च
प्रतिनायकोत्कर्षस्य तदभिभावकनायकोत्कर्षाङ्गत्वात्कथमवर्णनीयत्वमिति
वाच्यम् । यादृशस्य प्रतिनायकोत्कर्षवर्णनस्य तदभिभावकनायकोत्कर्षा-
ङ्गतासंपादकत्वं तादृशस्येष्टत्वात् । तद्विरोधिन एव निषेध्यत्वात् । न च
[Sanskrit Commentary]
तु काव्यप्रकाशनिर्दिष्टोऽयं दोषो ध्वन्यालोकोक्तदोषाभिन्नतया व्याख्यातः । अत्र
काव्यमर्मज्ञाः प्रमाणम् । अनर्हेऽवसर इति । 'अकाण्डे च प्रकाशनम्' इति
रूपेण ध्वन्यालोकोक्तोऽय दोषः । इदं च प्रकाशनमङ्गिरसातिरिक्तस्य रसस्य
बोध्यम् । अङ्गिरसपरिल्लुते हि सहृदयचेतसि तद्विरुद्धस्तत्समानाधिकरणस्तद्-
व्यधिकरणो वा रसो नास्वादनीयः । एतादृशरससमावेश इष्यमाणे तु उदासीन-
रसान्तरव्यवहितनिबन्धनादिनाऽविरोध उपपादनीया यथौचित्यम् । विच्छेदा-
नर्ह इति । अयमेवाकाण्डे विच्छेदः प्राचीनैरुक्तः । अयं चाङ्गिनमात्रविषयः । यद्वा
यथासम्भवमुभयविषयमिद दोषद्वयम् । उभयम् = अनवसरे प्रस्तावो विच्छेदश्च ।
दोषान्तरमाह — एवमित्यादिना । तद्विरोधिनः = नायकोत्कर्षप्रतिकूलस्य
[Hindi Translation]
और जिस रस का जहां विच्छेद उचित न हो वहां उसका विच्छेद भी दोष हैं।
जैसे — सन्ध्यावन्दन, देवपूजन आदि का वर्णन करते समय किसी कामुक पुरुष का
किसी कामिनी के प्रति अनुराग का वर्णन करने पर प्रथम दोष और महान् रणशूर
शत्रु द्वारा उपस्थित होकर नायक के प्रति मर्मभेदी वचन कहते समय नायक द्वारा
सन्ध्यावन्दन आदि कर्मों के वर्णन में द्वितीय दोष हैं। इसी प्रकार, नायक के विभिन्न
चरितों और गुण आदि की अपेक्षा प्रतिनायक के चरितादि का उत्कृष्ट वर्णन करना
भी दोष हीं है, क्योंकि ऐसा करने पर नायक का प्रतिनायक की अपेक्षा विवक्षित
उत्कर्ष अवगत नहीं होता । यद्यपि प्रतिनायक का उत्कर्ष उसका पराभव करने
वाले नायक के उत्कर्ष का परिपोषक होता है तथापि यह ध्यान रखना चाहिए कि
प्रतिनायक का जितना उत्कर्ष नायक के उत्कर्ष का परिपोषक हो उतने हीं उत्कर्ष
का वर्णन हो, उससे अधिक नहीं । उससे अधिक उत्कर्ष का वर्णन तो सर्वथा
परित्याज्य है । नायक द्वारा प्रतिनायक का अभिभव या विनाश करने से