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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 216

१८४ रसगङ्गाधरः
एवं स्थायिव्यभिचारिणामपि शब्दवाच्यत्वं दोषः । एवं विभावानुभाव-
योरसम्यक्प्रत्यये विलम्बेन प्रत्यये वा न रसास्वाद इति तयोर्दोषत्वम् । सम-
बलप्रबलप्रतिकूलरसाङ्गानां निबन्धनं तु प्रकृतरसपोषप्रतीपकमिति दोषः ।
दोषः । अत एव 'धातुः शिल्पातिशय……………………' इत्यत्र काव्यप्रकाशोदाहरणे
'शृङ्गारस्योपनतमधुना राज्यमेकातपत्रम्' इत्यत्र चतुर्थे पादे शृङ्गारशब्देनाभिधानेऽपि
न दोषः । अतश्च यत्र मुख्यतस्तत्प्रतिपादनं स्वशब्देन तत्रैव दोष इत्यपि मतम् ।
व्यभिचारिणामिति । यत्र पुनस्तद्व्यभिचारिविशेषनियतोऽनुभावादिर्न वर्त्तते
तत्र तेन व्यभिचार्यभिव्यक्तेः सन्दिग्धत्वात् स्वशब्देन व्यभिचार्यभिधानेऽपि न दोष
इति प्राञ्चः । यदुक्तम्—
"न दोषः स्वपदेनोक्तावपि सञ्चारिणः क्वचित् ॥" इति ।
समबलेत्यादि । समबलप्रतिकूलरसाङ्गानां प्रबलप्रतिकूलरसाङ्गानां चेत्यर्थः ।
आद्यनिबन्धने सुन्दोपसुन्दवदुभयोरनिष्पत्तिः, द्वितीये प्रकृताभिव्यक्तिप्रतिबन्धो दोषः ।
एतेन दुर्बलानामत एव प्रबलप्रकृतबाधकानां प्रतिकूलरसाङ्गानां निबन्धनं प्रकृतपरि-
पोषाय कर्त्तव्यमिति सूचितम् । प्रबन्ध इति । पुनः पुनद्दीप्तिः प्रायेण प्रबन्धकाव्य
एव सम्भवतीति प्रबन्ध इत्युक्तम् । सामग्र्येण = सम्भवद्यावदनुभावादिपरि-
जनकता होती उनका भी शब्दतः अभिधान होने पर होता है । इसी लिये इस दोष
को सामान्य दोष कहा गया है । रस-रसाभास-स्थलों में तो व्यङ्ग्य को वाच्य
बना देने पर 'निरर्थकत्व' नामक विशेष दोष भी होता, क्योंकि जिस व्यञ्जनामात्र-
गम्यत्व रूप में रस में आस्वाद्यता होती उस रूप में व्यक्त किये जाने के बाद पुनः
उसका वाच्य रूप में — जिस रूप में रस आस्वाद्य कभी नहीं होता — निर्देश करने
का कोई प्रयोजन रह नहीं जाता । यह कार्य तो बानर के कार्य के समान सर्वथा
निष्प्रयोजन है ।
इसी प्रकार, स्थायिभाव और व्यभिचारिभावों की भी शब्दवाच्यता एक दोष
है । किन्तु काव्यप्रकाशकार आदि का मत है कि जहाँ किसी विशेष व्यभिचारिभाव
का सुनिश्चित रूप में अभिव्यञ्जक अनुभाव कवि द्वारा निबद्ध न हो वहाँ व्यभि-
चारिभाव की असन्दिग्ध अभिव्यक्ति न होने से व्यभिचारिभाव के वाच्य होने पर
भी कोई दोष नहीं होता । इसी तरह, विभाव और अनुभाव की सम्यक्-प्रतीति न
होने और विलम्ब से प्रतीति होने पर भी रसास्वाद न होने से विभावादि की
असम्यक्-प्रतीति और विलम्ब-प्रतीति भी दोष हैं । प्रधान रस के समबल अङ्गरस
के और समबल अथवा प्रबल प्रतिकूल रस के विभावादि के निबन्धन से भी प्रधान
रस के आस्वाद में बाधा होती; अतः समबल अङ्ग रस के और समबल अथवा
प्रबल प्रतिकूल रस के विभावादि के निबन्धन भी दोष हैं ।