रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् १८३
इत्थमविरोधसंपादनेनापि निवध्यमानो रसो रसशब्देन शृङ्गारादिशब्दैर्वा
नाभिधातुमुचितः, अनास्वाद्यतापत्तेः। तदास्वादश्च व्यञ्जनमात्रनिष्पाद्य
इत्युक्तत्वात्। यत्र विभावादिभिरभिव्यक्तस्य रसस्य स्वशब्देनाभिधानं तत्र
को दोष इति चेत्, ? व्यङ्ग्यस्य वाच्यीकरणे सामान्यतो वमनाख्यदोषस्य
वक्ष्यमाणत्वात्। आस्वाद्यतावच्छेदकरूपेण प्रत्ययाजनकत्या रसस्थले वाच्य-
वृत्तेः कापेयकल्पत्वेन विशेषदोषत्वाच्च।
इदानीं रसदोषानभिधातुमुपक्रमते—इत्थमित्यादिना। पूर्वोक्तप्रकारेणेत्यर्थः।
निवध्यमानः = आस्वाद्यत्वेन प्रतिपिपादयिषितः। अनास्वाद्यतापत्तेरिति। विभावा-
द्यभिव्यक्तस्यैव रसस्यास्वाद्यत्वनियमादिति भावः। इयं चापत्तियंत्र केवलरसादि-
पदवाच्यत्वं न तु विभावाद्यभिव्यक्तत्वमपि तत्र बोध्यम्। यत्र तूभयं तत्राह—
यत्रेत्यादि। सामान्यत इति। सर्वेषां व्यङ्ग्यत्वेन चमत्कृतिजनकानां वाच्यत्वे
सत्ययं दोष इत्यभिप्रायेणेदमुक्तम्। केचित्त्वलङ्काराणां वाच्यत्वेऽपि क्वचिच्चमत्कृति-
जनकत्वं मन्यन्ते। रसस्थलमात्रे दोषमाह—आस्वाद्यतावच्छेदकरूपेणेत्यादिना।
वाच्यत्वाद्यसहकृतविभावाद्यभिव्यक्तत्वेन रूपेणेत्यर्थः। कापेयकल्पत्वेनेति।
कपेः कर्म कापेयम्, निरर्थकं कर्म, तत्सदृशत्वेनेत्यर्थः। विशेष इति रसस्थल-
मात्राभिप्रायेण। विभावाद्यभिव्यक्तस्यैवानुवादाभिप्रायेण स्वशब्देनाभिधाने तु न
यहाँ 'यौवनोन्मत्ताः' (नवयौवन के दर्प से समन्वित), 'गाढरक्ताः' (अत्यन्त
अनुरक्त) और 'वसुन्धरां समालिङ्ग्य शेरते' (ज्योतिष्मती—सुन्दरी नायिका का
आलिङ्गन कर सो रहे हैं) इन विशेषणों के श्लिष्ट होने से अप्रकृत कामुक पुरुषों
के व्यवहार की भी (समासोक्तिमाहात्म्यप्रयुक्त) प्रतीति होती ही है। किन्तु
प्रकृत-व्यवहार अप्रकृत-व्यवहार से अभिन्न रूप में भासित होता। यही 'अभेदेन
भासमानत्व' दोनों में अविरोध का निमित्त है॥
उपर्युक्त रीति से रसों में परस्पर-विरोधाभाव का उपपादन किये जाने पर भी
कवि को चाहिए कि जिस रस का उसे अपने काव्य में निबन्धन करना हो उसका
वह रस-शब्द से सामान्य रूप में अथवा विशेषरूप में शृङ्गार आदि शब्दों से उल्लेख
न करे, क्योंकि ऐसा करना अनुचित है—ऐसा करने से रस के वाच्य हो जाने से
उसमें आस्वाद्यता नहीं रह जाती। रस आस्वाद्य तभी होता जब वह व्यङ्ग्य
होता, अन्यथा नहीं—यह तथ्य प्रकट किया जा चुका है। यदि एक ओर कोई रस
अपने विभावादि से अभिव्यक्त हो रहा हो और दूसरी ओर उसका तद्वाचक शब्द
से सामान्य अथवा विशेष रूप में अभिधान भी किया गया हो तब तो 'वमन' नामक
दोष का होना आगे बताया जायगा। यह 'वमन' नामक दोष केवल रस के विषय
में ही नहीं अपि तु जिन अलङ्कारादि तत्त्वों में व्यङ्ग्य होने पर ही चमत्कार-