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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 211

प्रथमाननम् १७९
अत्र समासोक्त्यवयवाभ्यां तरुकामिकर्तृकरिपुकामिनीकबर्यादिग्रहण-
रूपाभ्यां प्रकृताप्रकृतव्यवहाराभ्यां व्यक्तयोः करुणशृङ्गारयो राजविषयक-
रतिभावाङ्गत्त्वम् ।
किं च प्रकृतरसपरिपृष्टिमिच्छता विरोधिनोऽपि रसस्य बाध्यत्वेन
निबन्धनं कार्यमेव । तथा हि सति वैरिविजयकृता वर्ण्यस्य कापि शोभा
संपद्यते । बाध्यत्वं च रसस्य प्रबलैर्विरोधिनो रसस्याङ्गैरविद्यमानेष्वपि
स्वाङ्गेषु निष्पत्तेः प्रतिबन्धः । व्यभिचारिणो बाध्यत्वं तु तदीयरसनिष्पत्ति-
प्रतिबन्धमात्रात्, न त्वनभिव्यक्त्या, अभिव्यक्तौ बाधकाभावात् । न च
विषयकरतिभावाङ्गत्वेन न परस्परं विरोध इत्युपपादयति—अत्रेत्यादिना ।
अवयवत्वं च प्रकृताऽप्रकृतधर्मिकव्यवहारयोः समासोक्तिप्रतिपाद्यार्थघटकत्वम्, प्रथमे
तदुपपादकत्वं वा ।
परिपुष्टिमिच्छतेति । एतेनात्रापि तयोरङ्गाङ्गिभावः सूचितः, परिपोषकस्यै-
वाङ्गतया प्रसिद्धेः । सुराङ्गनेत्यादिना पूर्वं मुक्तकेऽविरोधोऽत्र तु प्रबन्धेऽविरोध इति
पृथगुपादानं न पुनरुक्तिदोषास्पदम् । ब्राह्मणवसिष्ठन्यायेन वा । अङ्गैरित्यत्र कर्त्तरि
तृतीया । स्वाङ्गेष्वित्यत्र स्वपदं बाध्यपरम् । निष्पत्तिरभिव्यक्तिः, आस्वाद इति
यावत् । प्रसङ्गाद् व्यभिचारिणो बाध्यत्वं निरूपयति—व्यभिचारिण इत्यादिना ।
इस पद्य में विशेषणों के श्लिष्ट होने के कारण प्रकृत वृक्षों के कार्य से अप्रकृत
कामुक पुरुष के कार्य ( व्यवहार ) की भी प्रतीति होती है और इस प्रकार प्रकृत
वृक्ष के व्यवहार से करुण की और अप्रकृत कामुक के व्यवहार से शृङ्गार की
अभिव्यक्ति होती है । ये दोनों ही वक्ता की राजविषयक रति ( स्तुति ) के अङ्ग
हैं । अत अङ्गभूत करुण और शृङ्गार में किसी साक्षात् सम्बन्ध के अभाव में कोई
विरोध नहीं है ।
और भी, कवि को चाहिए कि वह प्रकृत मुख्य रस को परिपुष्ट करने के लिए
उसके विरोधी रसों का भी 'बाध्य रसों' के रूप में अपने काव्य में वर्णन अवश्य
करे । इससे मुख्य रस में अपने विरोधी रसों के पराभव से एक विलक्षण चमत्कृति
आ जाती है । किसी भी रस को 'बाध्य' कहने का अर्थ यही है कि उसके विरोधी
मुख्य रस के अङ्गों का प्रबल चित्रण होने से मुख्य रस की ही प्रतीति ( अर्थात
आस्वाद ) हो पाती, दुर्बल रूप में वर्णित उस रस की नहीं । किन्तु व्यभिचारिभाव
के बाध्य होने का अर्थ केवल यह है कि उससे रस की अभिव्यक्ति नहीं होती, जहाँ
तक स्वयं व्यभिचारिभाव की अभिव्यक्ति का प्रश्न है वह तो होती ही है, क्योंकि
उसकी अभिव्यक्ति में कोई बाधक नहीं है । यह आशङ्का नहीं करनी चाहिए कि
विरोधी ( = बाधक ) रस के अङ्गभूत विभावादि की अभिव्यक्ति से बाध्य रस के
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