रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् १७७
तद्गत एव शोके प्रकर्षकत्वादङ्गम् । यदि तु नायकगता रतिर्नात्र प्रती-
यते किं तु निरुक्तसामग्र्या शोक एव प्रकृतत्वादित्यागृह्यते, तदा नाय-
कालम्बना प्रत्युद्गमाद्यनुभाविता हर्षादिभिः पोषिता नायिकाश्रया रतिरेव
तत्राङ्गमस्तु, नायिकागतरतेर्नायकशोकप्रकर्षहेतुतायाः सर्वसंमतत्वात् ।
न च नायिकाया नाशात्तद्गताया रतेरसंनिधानात्कथमङ्गतोति वाच्यम् ।
जीवनकाले अनुभूयमाना मरणोत्तरं च स्मर्यमाणापि सा रत्याद्यभिव्यञ्जने न
विशेषवतीति । अत्र च नायिकाविषयकनायकनिष्ठशोकस्य नायकनिष्ठनायिका-
विषयकरत्यभावेऽसम्भवात्सापि प्रतीयत आक्षिप्यते वेति 'यदि तु' इत्यनेन सूच्यते ।
नात्र प्रतीयत इति । नायकनिष्ठनायिकाविषयकरतिव्यञ्जकसामग्र्यवर्णनादिति
भावः । निरुक्तसामग्र्या = नायिकाकर्त्तृ कसविनयप्रत्युद्गमनादिसामग्र्या । अत्र
'यद्यालम्बनविनाशान्नायकनिष्ठरतेरप्रतीतिरित्यभ्युपगम्यते तदाश्रयविनाशान्नायिका-
निष्ठरतेः प्रतीतिः कथंकारं स्यात्, उभयोर्वैषम्ये बीजाभावात् । यदि तु वक्ष्यमाण-
रीत्या स्मर्यमाणाया नायिकानिष्ठाया रतेः शोकाङ्गत्वं न्याय्यम् तर्हि तादृश्या
नायकनिष्ठरतेरपि तत्त्वे बाधकाभावात्' इति यदुक्तं चन्द्रिकायाम् तदापातत ,
नायिकाकर्त्तृकातीतकालिकसविनयप्रत्युद्गमनादेर्नायकनिष्ठरतिस्मारकस्य साक्षा-
द्वर्णितत्वम्, नायकनिष्ठाया रतेस्तु साक्षात्स्मारकस्य तस्याभाव एवेति वैषम्यस्य स्फुटं
प्रतीयमानत्वात् । प्रकारान्तरेण प्रतीयमानत्वमाक्षिप्यमाणत्वं वा नायकनिष्ठरतेरपि
आदि में अभेद भी नहीं और सजातीयता भी नहीं; अतः रति और शोक को
'तुल्यसामग्र्यभिव्यक्त,' कहना संगत नहीं लगता तथापि रत्यभिव्यञ्जक जो
सामग्री ( अगवानी करना आदि ) पद्य में निर्दिष्ट है उसी को लेकर रति और
शोक दोनों को 'तुल्यसामग्र्यभिव्यक्त' कहा गया है। यह सामग्री जीवन-काल
और मृत्योत्तर-काल में क्रमशः रति का और शोक का अभिव्यञ्जक है हीं । अत एव
यह भी स्पष्ट है कि नायक द्वारा अनुभूयमान यह सामग्री रति का और स्मर्यमाण
यही सामग्री शोक का अभिव्यञ्जक है। परन्तु इससे सहृदयों में रस की अभिव्यक्ति
में कोई अन्तर नहीं पड़ता। यदि यह आग्रह किया जाय कि यहाँ नायकनिष्ठ
रति की अभिव्यक्ति नहीं होती, क्योंकि प्रत्युद्गमन आदि सामग्री नायकविषयक
नायिकानिष्ठ रति का हीं अभिव्यञ्जक है; हां उत्तरार्ध से नायकनिष्ठ शोक की
अभिव्यक्ति अवश्य होती तो उक्त प्रत्युद्गमन आदि अनुभावों से अभिव्यक्त और
व्यज्यमान हर्ष आदि से परिपोषित नायिकानिष्ठ रति हीं नायकनिष्ठ शोक का
परिपोषक होने से इसका अङ्ग हो । नायिका की नायक विषयक रति का नायिका
के अभाव में नायकगत शोक का परिपोषक होना सर्वसम्मत हैं हीं । यहाँ यह आशङ्का
नहीं करनी चाहिए कि नायिका के विनष्ट हो जाने से तन्निष्ठ रति का नायक को