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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 414 में से

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पृष्ठ 204

१७२ रसगङ्गाधरः
रसान्तरस्याविरोधिनः सन्धिकर्तुरिवान्तरालेऽवस्थापने द्वितीयोऽपि
निवर्तते। यथा मन्निर्मितायामाख्यायिकायां कण्वाश्रमगतस्य श्वेतकेतो-
र्महर्षेः शान्तरसप्रधाने वर्णने प्रस्तुते 'किमिदमनाकलितपूर्वं रूपम्, कोऽयम-
निर्वाच्यो वचनरचनाया मधुरिमा' इत्यद्भुतस्यान्तरवस्थापनेन वरवर्णिनीं
प्रत्यनुरागवर्णने।
यथा वा—
सुराङ्गनाभिराश्लिष्टा व्योम्नि वीरा विमानगाः ।
विलोकन्ते निजान्देहान्फेरुनारीभिरावृतान् ॥
नावतिष्ठन्ते । अत्रोत्साहस्य युष्मदर्थे भयस्य च परपदार्थे शत्रौ वर्णनान्न तयोर्विरो-
धोऽपि तु भयस्योत्साहपरिपोषकत्वमेवेति भावः ।
रसान्तरस्येति । रसान्तरचर्वणया इत्यर्थः। सन्धिकर्तुरिति। वादिप्रतिवादिनो
प्रति पक्षपातरहितस्य तद्द्वयाविरोधिन इत्यर्थः । द्वितीयः = तज्ज्ञानप्रतिवध्यज्ञान-
कत्वरूपो विरोधः । मध्ये च चर्व्यमाण उदासीन उभयोरविरोधी रसो वाक्यार्थो वा
भवेदाक्षेपलभ्यो वा भवेदित्यत्र न विशेषः । आद्यस्योदाहरणं स्वनिर्मिताख्यायिकातो
दत्त्वा द्वितीयस्योदाहरणमाह—यथा वेति । रसस्याक्षेपलभ्यत्वं तद्व्यञ्जकसाम-
ग्र्याक्षेपादुक्तम् ।
निजान् देहान् इत्यस्य मृतान् स्वदेहानित्यर्थः । फेरुनारीभिः = शृगालीभिः ।
उपलक्षणमेतद् गृध्रादेरपि बोध्यम् । एतेनोदाहरणेन द्वितीयोऽयं विरोधो भिन्न-
विरोधी टिक न सके ।।”
इस उदाहरण में राजा में वीर और उसके शत्रुओं में भयानक रस का वर्णन
किये जाने से इन दोनों में कोई विरोध नहीं (अपि तु शत्रुगत भय राजगत उत्साह
का परिपोषक हीं ) है ।
द्वितीय प्रकार के विरोध का परिहार तब हो जाता है जब दो विरोधी
व्यक्तियों के बीच सन्धि कराने वाले मध्यस्थ के समान दो विरोधी रसों के बीच
कोई उदासीन रस निबद्ध कर दिया जाय । जैसे मेरे द्वारा रचित आख्यायिका
में कण्व के आश्रम में पहुँचे महर्षि श्वेतकेतु के शान्तरस तथा वरवर्णिनी नामक
नायिका के शृङ्गार रस के वर्णनों के बीच : 'यह कैसा अदृष्टपूर्वं सौन्दर्य ! वाणी
में यह कैसी वर्णनातीत मधुरता ?” इस वर्णन द्वारा अद्भुत रस के निबन्धन से
शान्त और शृङ्गार का विरोध समाप्त हो गया है। अथवा जैसे—
“आकाश में विमान द्वारा जाने वाले ये ऊर्ध्वगमनशील महापुरुष दिव्याङ्गनाओं
से आलिङ्गित होकर सियारिनियों से घिरे अपने भौतिक शरीरों को देख रहे हैं।।”