रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ | रसगङ्गाधरः
व्यक्तेस्तत्तद्भेदां च हेतुहेतुमद्भावासंगत्यापत्तेः ॥
अथ कथमेत एव रसाः, भगवदालम्बनस्य रोमाञ्चाश्रुपातादिभिरनु-
भावितस्य हर्षादिभिः परिपोषितस्य भागवतादिपुराणश्रवणसमये भगवद्भ-
क्तैरनुभूयमानस्य भक्तिरसस्य दुरपह्नवत्वात् । भगवदनुरागरूपा भक्ति-
श्चात्र स्थायिभावः । न चासौ शान्तरसेऽन्तर्भावमर्हति, अनुरागस्य
वैराग्यविरुद्धत्वात् ? उच्यते—भक्तेर्देवादिविषयरतित्वेन भावान्तर्गततया
रसत्वानुपपत्तेः ।
रतिर्देवादिविषया व्यभिचारी तथाऽञ्जितः ।
भावः प्रोक्तस्तदाभासा ह्यनौचित्यप्रवर्त्तिताः ॥
दिना । असंगत्यापत्तेरिति । हेतुहेतुमद्भावस्य पौर्वापर्यंनियतत्वादित्यर्थः ॥
भक्तिरसं निरस्यन् पूर्वपक्षमाह—अथेत्यादिना । प्राचाम् = काव्यप्रकाशकारा-
णाम् । अन्येषां भामहादीनामिदमुपलक्षणम् । स्वातन्त्र्ययोगात् = भरतादिमुनिवचना-
नामेव स्वातन्त्र्येण योगः, स्वातन्त्र्यवत्त्वम् कीदृशस्य रत्यादेर्भावितवम् कीदृशस्य च
स्थायित्वम् इत्यत्र, न त्वस्मदादीनाम् । अत्र एवात्र 'स्वातन्त्र्याऽयोगात्' इत्यपि
पाठान्तरं न विरुध्यते । मुनीनां नियोगपर्यनुयोगानर्हत्वमेव तेषां स्वातन्त्र्ययोगे,
अस्मदादीनां पुनस्तदर्हत्वमेव स्वातन्त्र्याऽयोगे हेतुः । शेषो ग्रन्थो निगदव्याख्यातः ॥
का ऊपर से सूई द्वारा वेधन करने में क्रम के वर्तमान होने पर भी उस क्रम का
बोध लोगों को नहीं होता ।
अब पुनः प्रश्न है—नौ हीं रस कैसे माने गये हैं, क्योंकि इनसे अतिरिक्त भक्ति
रस भी तो है ? भजनीय देव इसके आलम्बन विभाव होते, रोमाञ्च, अश्रुपात
आदि इसके अनुभाव और व्यज्यमान हर्ष आदि इसके व्यभिचारिभाव होते ।
भक्ति, अर्थात् भगद्विषयक परमानुराग, इसका स्थायिभाव है। भागवत आदि
पुराणों के श्रवण के समय भक्तों को इसका आस्वाद भी होता हीं है। ऐसी
स्थिति में इसे एक स्वतन्त्र रस अवश्य मानना चाहिए था; क्योंकि शृङ्गारादि में
तो इसका अन्तर्भाव असम्भव है। रही बात शान्तरस की, तो उसमें भी इसका
अन्तर्भाव नहीं हो सकता, क्योंकि शान्तरस का स्थायिभाव वैराग्य—निर्वेद है जो इस
भक्तिरस के परमानुरागस्वरूप भक्त्यात्मक स्थायिभाव से विपरीत है। अतः एक
अतिरिक्त भक्तिरस के प्रमाणसिद्ध होने से इसकी उपेक्षा कर नौ हीं रस मानना
अयुक्त है। इसका उत्तर देते हुए गङ्गाधरकार कहते कि देवादिविषयकरतिस्वरूप
यह भक्ति एक 'भाव' है, स्थायिभाव नहीं । अत एव काव्यप्रकाशकार ने कहा है—
"देवादिविषयक रति और विभावादि से अभिव्यञ्जित व्यभिचारी को 'भाव'