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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 414 में से

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पृष्ठ 198

१६६ रसगङ्गाधरः
पद्यश्रोतुश्च रसास्वादाधिकरणत्वेन लौकिकहासजुगुप्साश्रयत्वानुपपत्तिरिति
चेत् ? सत्यम् । तदाश्रयस्य द्रष्टृपुरुषविशेषस्य तत्राक्षेप्यत्वात् । तदना-
क्षेपे तु श्रोतुः स्वीयकान्तावर्णनपद्यादिव रसोद्बोधे बाधकाभावात् ।
एवं च संक्षेपेण निरूपिता रसाः ॥
एषां प्राधान्ये ध्वनिव्यपदेशहेतुत्वम्, गुणीभावे तु रसालङ्कारत्वम् ।
म्बनस्यैवेत्येवकारेण आश्रयव्यवच्छेदः । रसास्वादेति । अलौकिकजुगुप्साद्या-
श्रयेत्यर्थः । अनुपपत्तेरिति । अलौकिकत्वलौकिकत्वयोः परस्परविरुद्धत्वेनैकस्यो-
भयधर्मविशिष्टजुगुप्साद्याश्रयत्वासम्भवादित्यर्थः । आक्षेप्यत्वादिति । तदुक्तं
साहित्यदर्पणे—
यस्य हासः स चेत् क्वापि साक्षान्नैव निबध्यते ।
तथाप्येष विभावादिसामर्थ्यादवसीयते ॥ इति ।
तदनाक्षेप इति । अनुभवविषयत्वमनाक्षेपे हेतुः ॥
रसालङ्कारत्वमिति । रसकर्तृकं स्वभिन्नशोभाधायकत्वमित्यर्थः । अत्र
विशेष आननानन्ते वक्ष्यते । एतदुक्तं लोचने—‘तस्मात् स्थितमेतत् —अभिव्यज्यन्ते
स्वरूप रत्यादि के आश्रय सहृदयभिन्न दुष्यन्त आदि हीं होते वैसे ही इनके आश्रय
को भी सहृदयभिन्न होना चाहिए । तात्पर्य यह है कि लौकिक रत्यादि के अधिकरण
को ही आश्रय कहा जाता । अलौकिक रत्यादि के अधिकरण लौकिक रत्यादि के
अधिकरण हो नहीं सकते । अतः सहृदयों को हास आदि के आश्रय कह नहीं सकते ।
ऐसी स्थिति में योग्य आश्रय के अभाव में हास्य और बीभत्स रसों की अभिव्यक्ति
कैसे होती ? इसका एक उत्तर तो यह है कि हास्य और बीभत्स रसों की प्रतीति
के आधार पर इनके आश्रयों के वर्णित न होने पर भी उनका आक्षेप कर लेना
चाहिए, क्योंकि अभिव्यक्ति अपनी सामग्री के बिना सम्भव नहीं है । यदि आक्षेप
करने में कोई अनौचित्य प्रतीत होता हो तो दूसरा उत्तर यह है कि इन दो रसों के
प्रसङ्ग में स्थायिभावों के आश्रय सहृदय हीं होते । उनके अलौकिक रस के आश्रय
होने के साथ-साथ लौकिक स्थायिभावों के भी आश्रय होने में कोई विरोध नहीं
है । यह अपनी हीं प्रियतमा के वर्णन को सुनकर स्वप्रियतमालम्बनक रसास्वाद
करने वाले सहृदयों में स्वीकार्य है हीं, क्योंकि वहाँ अन्य आश्रय की कल्पना
असम्भव है । अतः एक हीं सहृदय के अलौकिक एवं लौकिक रत्यादि का आश्रय
होने में कोई बाधा नहीं है ॥
इस प्रकार रसों का संक्षिप्त निरूपण किया जा चुका ॥
जब ये रस प्रधान रूप में अभिव्यक्त होते तब इन्हें ‘ध्वनि’ कहा जाता, किन्तु