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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 197

प्रथमाननम् १६५
अत्र श्येन आलम्बनम् । सवेगापतनमुद्दीपनम् । आननशोषादयो-
ऽनुभावाः । दैन्यादयः संचारिणः ॥
बीभत्सो यथा—
नखैर्विदारितान्त्राणां शवानां पूयशोणितम् ।
आननेष्वनुलिम्पन्ति हृष्टा बेतालयोषितः ॥
शवा इहालम्बनम् । अन्त्रविदारणाद्युद्दीपनम् । आक्षिप्ता रोमाञ्च-
नेत्रनिमीलनादयोऽनुभावाः । आवेगादयः संचारिणः ॥
ननु रतिक्रोधोत्साहभयशोकविस्मयनिर्वेदेषु प्रागुदाहृतेषु यथालम्बना-
श्रययोः संप्रत्ययः, न तथा हासे जुगुप्सायां च । तत्रालम्बनस्यैव प्रतीतेः ।
आननेषु स्वकीयेष्वेव । शवा इति । विदारितान्त्राणां शवानां तद्विदारि-
काणां वेतालयोषिताञ्च जुगुप्साविषयतया समुच्चितं तदुभयमालम्बनम्, विकल्पितं
वाऽन्यतरदित्यभिप्रायेण शवानामालम्बनमुक्तम् । आन्त्रविदारणादित्यादिपदेन पूय-
शोणित नुलिम्पनग्रहणम् । आक्षिप्ताः = अनुमिताः, व्यक्ता वा । रोमाञ्चेत्यादि ।
जुगुप्साश्रयपुरुषान्तराक्षेपपक्षे तदाश्रिताः, श्रोतुरेवाश्रयत्वे तु श्रोत्राश्रिता एवैते ।
न तथेति । आलम्बनस्याश्रयस्य च पृथक् पृथक् सम्प्रत्ययो नेत्यर्थः । आल-
यहाँ बाज पक्षी आलम्बन विभाव है, उसका तेजी से नीचे उतरना उद्दीपन
विभाव है। गले का सूखना आदि अनुभाव हैं और विकलता आदि व्यभिचारिभाव
हैं। इस सबसे भयानक रस की अभिव्यक्ति हो जाती है॥
बीभत्स रस का उदाहरण इस प्रकार है—
"बेतालों की स्त्रियां युद्धभूमि में पड़े ढेर शवों को देखकर प्रसन्न होती हुईं
उन शवों की अंतड़ियों को अपने नखों से फाड़कर उनसे निकलते हुए मवाद
खून को अपने मुँह पर लेप रही हैं !!"
यहाँ शव ( अथवा शवों को नोचने-खसोटने वाली वेतालों की स्त्रियाँ )
आलम्बन हैं और अँतड़ी फाड़ना आदि उद्दीपन विभाव हैं। आक्षेपलभ्य रोमाञ्च
और आँखों का मूँदना आदि अनुभाव हैं और आवेग आदि व्यभिचारिभाव ।
इन सब से बीभत्सरस की अभिव्यक्ति होती॥
यहाँ एक प्रश्न उठता है—रति, क्रोध, उत्साह, भय, शोक, निर्वेद के एक-एक
आलम्बन और उनसे भिन्न एक-एक आश्रय होते। किन्तु हास और जुगुप्सा के
तो केवल आलम्बनों की प्रतीति होती, उनके आश्रयों की तो प्रतीति होती ही
नहीं। रस, अर्थात् अलौकिक हास और जुगुप्सा, का अनुभव करने वाले सहृदय
पाठक-श्रोता-द्रष्टा तो आश्रय हो नहीं सकते, क्योंकि जैसे लौकिक स्थायिभाव-