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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 414 में से

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पृष्ठ 196

१६४ रसगङ्गाधरः
आकुञ्चिताक्षि मन्द्रं च विदुर्विहसितं बुधाः ।
निकुञ्चितांसशीर्षंश्च जिह्मदृष्टिविलोकनः ॥
उत्फुल्लनासिको हासो नाम्नोपहसितं मतम् ।
अस्थानजः साश्रुदृष्टिराकम्पस्कन्धमूर्धजः ॥
शार्ङ्गदेवेन गदितो हासोऽपहसिताह्वयः ।
स्थूलकर्णकटुध्वानो बाष्पपूरप्लुतेक्षणः ॥
करोपगूढपार्श्वश्च हासोऽतिहसितं मतम् ॥ इति ।
भयानको यथा —
श्येनमम्बरतलादुपागतं शुष्यदाननबिलो विलोकयन् ।
कम्पमानतनुराकुलेक्षणः स्पन्दितुं नहि शशाक लावकः ॥
जिह्मदृष्टीति । जिह्मा दृष्टिः—
लम्बिताकुञ्चितपुटा शनैस्तिर्यङ्निरीक्षणी ।
निगूढा गूढतारा च जिह्मा दृष्टिरुदाहृता ।। ( ना० शा० ८।७० )
इति भरतेन लक्षिता, तया विलोकनं यत्रेति व्यधिकरणपदो बहुव्रीहिः । 'जिह्मदृष्टि-
विलोचनः' इति पाठेऽपि व्यधिकरणबहुव्रीहिक्लेशो जायते । अस्थानजः =
अस्थाने अनवसरे शोकादिकाले जायमानः । मूर्धजस्य केशस्योत्कम्पमानत्वकथनेन
मूर्ध्नोऽपि तथात्वं सूच्यते ।।
सम्प्रति भयानकमूदाहरति - श्येनेत्यादिना । शुष्यदाननमेव बिलं यस्य स
लावकः पक्षिविशेषः ।
संवेगापतनं श्येनस्यैव लावके। सञ्चारिण इत्यनन्तरं भयानकस्य व्यञ्जका
इति बोध्यम् ।
कर देता हो उस हास को 'विहसित' कहते । इसीको भाषा में 'ठहाका' कहा
जाता । 'उपहसित' उस हास को कहा जाता जिसमें कन्धा और सिर सिकुड़
जाँय, नजर तिरछी हो जाय और नाक फूल जाय । जो हास अनवसर में ही उत्पन्न
हुआ हो, जिसमें आंखों में आंसू छलक आये हों और जिसमें कन्धा, शिर और
बाल हिलने लगते हों उसे शार्ङ्गदेव ने 'अपहसित' कहा है । जिस हास मे कर्णकटु
मोटी आवाज होती हो, आंखों से आंसू की धार बहने लगे और हँसने वाला अपने
हांथों से पेट को दबाने लगे उसे 'अपहसित' माना गया है ॥
अब भयानक रस का उदाहरण दिया जा रहा है :-
"जब बटेर ने आसमान से नीचे उतरते हुए बाज को देखा तो उसका गला
सूख गया, उसका देह कांपने लगा, उसकी आंखों में आंसू भर आये और वह वहाँ
से हिल भी न सका ॥"