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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 193, कुल 414 में से

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पृष्ठ 193

रत्वमुचितम्। भक्तिर्नैवात्र प्रतीयत इति चेद् ? दरमुकुलितलोचनं विदां-
कुर्वन्तु सहृदयाः ॥
हास्यो यथा—
श्रीतातपादैर्विहिते निबन्धे निरूपिता नूतनयुक्तिरेषा।
अङ्गं गवां पूर्वमहो पवित्रं न वा कथं रासभधर्मपत्न्याः ॥
तार्किकपुत्रोऽत्रालम्बनम्। तदीया निःशङ्कोक्तिरुद्दीपिका। रदन-
प्रकाशादिरुद्वेगादयश्चानुभावव्यभिचारिणः।
तातपादैः = पितृचरणैः। कथमित्यनेन गर्दभधर्मपत्न्या गर्दभ्या अपि पूर्वाङ्गं
गोपूर्वाङ्गवत् पवित्रम्, चतुष्पदस्त्रीपूर्वाङ्गत्वस्य पवित्रताधिकरणतावच्छेदकत्वेन
तातपादाभिमतस्य तत्रापि तुल्यत्वादिति सूच्यते।
तार्किकपुत्र इति। तार्किकोऽत्रालम्बनमिति युक्तम्, मूलवक्तुरेवालम्बन-
त्वौचित्यात्। अन्यथा सर्वत्र कवेरेवालम्बनत्वापत्तेः। यद्वा श्रोतुस्तार्किकपुत्रवचन-
श्रवणादेव हासो जायत इति यथाश्रुतं संगमनीयम्। तदीया=आलम्बनत्तृका।
रदनेत्यादि। रदनं दन्तः, तस्य प्रकाशादिरनुभावः, उद्वेगादयश्च वक्ष्यमाणलक्षणा
अर्जुन मे श्रीकृष्णालम्बनक विस्मय की है। अतः जैसे अर्जुन में प्रतीयमान
विस्मय अर्जुन की श्रीकृष्ण-विषयक भक्ति का अङ्ग है उसी तरह यह विस्मय भी
बलि की वामन-विषयक भक्ति का अङ्ग है। अत एव 'चित्रं महानेष.........'
इत्यादि पद्य में प्रतीयमान विस्मय अन्यत्र रसपर्यन्त प्रकर्ष को प्राप्त होने पर भी
प्रकृत में भक्ति का अङ्ग होने से अलङ्कार मात्र है जिसे 'ब्राह्मणश्रमण' न्यायानुसार
रसवदलङ्कार या रसालङ्कार कहा जा सकता है, रस नहीं। प्रकृत पद्य में भक्ति की
प्रतीति नहीं होती—यह तो नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वामन के सब कुछ के
लोकोत्तरत्व-कथन पर जरा-सा दृष्टिपात करते हीं सहृदयों को बलिनिष्ठ वामन-
विषयक भक्ति की प्रतीति होने में कोई संशय नहीं रह जाता। अतः उक्त उदाहरण
असंगत है ॥
हास्य रस का उदाहरण निम्नलिखित है—
“मेरे पिता जी ने अपने निबन्ध (ग्रन्थ) में एक नई युक्ति बतलाई है कि यदि
चतुष्पद गाय के शरीर का पिछला भाग धर्मशास्त्र के अनुसार पवित्र है तो गर्दभी
के शरीर का पिछला भाग पवित्र क्यों न माना जाय ? अर्थात् वह भी पवित्र
है हीं ॥”
अपने कुतार्किक पिता की बात कहने वाला उसका पुत्र यहाँ हास्य का आलम्बन
है। उसका निःशङ्क उक्त कथन उद्दीपन विभाव है और उसका दांत विचकाना
एवम् उद्वेग आदि व्यभिचारिभाव हैं। इन सबसे हास्य रस की ध्वनि