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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 191

प्रथमाननम् १५९
प्रतीतायां वा तस्यां विस्मयस्य गुणत्वं न युज्यते । एवं कश्चिन्महापुरु-
षोऽयमिति भक्तिरपि तस्याः पुत्रे ममायं बाल इति निश्चयेन प्रतिबन्धा-
दुत्पत्तु मेव नेष्टे । अतस्तस्यामपि विस्मयस्य गुणीभावो न शङ्क्यः ।
यच्च सहृदयशिरोमणिभिः प्राचीनैरुदाहृतम्—
चित्रं महानेष तवावतारः क्व कान्तिरेषाऽभिनवैव भङ्गिः ।
लोकोत्तरं धैर्यमहो प्रभावः काप्याकृतिर्नूतन एष सर्गः ॥ इति,
प्रतीतायामित्यादि । यत्र विद्यमानत्वाद्वस्तुतस्तस्याः प्रतीतिः स्वीक्रियते तत्र
परस्परविरुद्धत्वात्तत्प्रतिबद्धोऽनुत्कटविस्मयो न संगच्छते, यत्र पुनरुत्कटो विस्मयः
स्पष्टं प्रतीयते तत्रैतत्प्रतिबद्धा प्रीतिर्न प्रतीयते इति युगपदुभयोरसम्भवान्न प्रीति-
विस्मययोरङ्गाङ्गिभावः शक्योपपाद इति तात्पर्यम् । प्रकृतपद्ये कथञ्चित् प्रतीय-
मानाऽपि प्रीतिरुत्कटं प्रतीयमानस्य विस्मयस्यात्मगुणीभावं न प्रतिपादयितुं क्षमा,
अनुत्कटत्वादिति मर्मप्रकाशव्याख्यानम् । प्रीतिश्चात्र वात्सल्यरूपा प्रकृष्टविषयिण्याः
परानुरक्तिरूपाया भक्तिपदाभिधेयाया विजातीयैव, अनयोरेव च प्रतिबध्यप्रतिबन्धक-
भावोऽनुभवानुरोधादिति बोध्यम् ।
प्राचीनैः = काव्यप्रकाशकारैः । चित्रमित्यादि । बलिर्वामनमभिधत्ते । तवैष महान्
नवश्चावतारश्चित्रम्, अलोकिकः । आश्चर्यमित्यपव्याख्यानम्, तथा सति स्थायिनो
वाच्यत्वापत्तेः । एषा साक्षात्क्रियमाणा तव कान्तिः क्व ? न कुत्रापीत्यर्थः । तव
अभिव्यञ्जक तत्त्व विद्यमान नहीं है । जहां प्रीति ( वात्सल्य ) व्यङ्ग्य होती वहाँ
विस्मय की प्रतीति होती ही नहीं, क्योंकि उत्कट-अनुत्कट वात्सल्यस्वरूप प्रीति-
विस्मय में विरोध होने से दोनों की एक साथ प्रतीति हो नहीं सकती । अतः उक्त
प्रीति का प्रकृत में प्रतीयमान उत्कट विस्मय कभी गुण (अङ्ग) नही हो सकताः इसी
प्रकार श्रीकृष्ण के प्रति यशोदा का पुत्रभाव होने से श्रीकृष्ण में उनके महापुरुषत्व
के कारण यशोदा की भक्ति भी नहीं हो सकती, क्योंकि पुत्रभाव का निश्चय भक्ति
का प्रतिबन्धक है । भक्ति सर्वदा भक्त की अपेक्षा भजनीय में जिस उत्कर्ष के ज्ञान की
आवश्यकता रखती पुत्र के विषय में तादृश उत्कर्ष का ज्ञान हो नहीं सकता । अतः
यशोदा का विस्मय उनकी श्रीकृष्णविषयक भक्ति का भी अङ्ग नहीं हो सकता ।
सहृदय शिरोमणि प्राचीन आचार्य ( मम्मट ) ने अद्भुत रस का यह
उदाहरण दिया है—
"हे भगवन् ? यह तुम्हारा वामन अवतार अत्यन्त अलौकिक है; तुम्हारी यह
छटा अन्यत्र कहाँ ! यह शरीर-संघटना भी अपूर्व है; तुम्हारा धैर्य; प्रभाव और
आकृति लोकोत्तर हैं; निश्चय ही यह एक नई सृष्टि है ।"