रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ रसगङ्गाधरः
अद्भुतो यथा—
चराचरजगज्जालसदनं वदनं तव ।
गलद्गगनगाम्भीर्यं वीक्ष्यास्मि हृतचेतना ॥
कदाचिद्भगवतो वासुदेवस्य वदनमालोकितवत्या यशोदाया इयमुक्तिः ।
अत्र वदनमालम्बनम् । अन्तर्गतचराचरजगज्जालदर्शनमुद्दीपनम् । हृत-
चेतनत्वम् तेन गम्यं रोमाञ्चनेत्रस्फारणादि चानुभावः । त्रासादयो व्यभि-
चारिणः । नैवात्र विद्यमानापि पुत्रगता प्रीतिः प्रतीयते, व्यञ्जकाभावात् ।
चराऽचरेत्यादि । चराचरात्मकस्य जगज्जालस्य सदनमाश्रयः । अत्र विस्मय-
पोषकत्वादुद्देश्यविधेयभावव्यत्यासो गुण एव । गलद्गगनेत्यादि । गलद् यद्
गगनं तस्य गाम्भीर्यमिव गाम्भीर्यं यत्र । गगनस्योर्ध्ववीक्षणे गाम्भीर्यं प्रसिद्धम्,
तादृशं गगनं यदि निपतेत् तर्हि निपतितेऽपि तस्मिन् तद्गाम्भीर्यं स्यादेवेत्याशयः ।
एवमर्थे तु 'गलद्गगनगम्भीरम्' इति पाठः श्रेयान् स्यात् । अथवा गगनस्य गाम्भीर्यं
गगनगाम्भीर्यम्, तद् गलत्तिरस्कुर्वद्वदनम्, अन्तर्भावितण्यर्थत्वात् ।
का अपलाप नहीं किया जा सकता, परन्तु 'अपि व्यक्ति.........' आदि पद्यों में
पाण्डित्योत्साहादि की व्यञ्जना नहीं होती; अतः पाण्डित्यवीरादि मान्य नहीं हैं—
यह कहना सम्भव नहीं है, क्योंकि ऐसी नियुक्तिक मान्यता तो राजाज्ञा मात्र
में सम्भव है, विवेचकों की दृष्टि में नहीं । अतः पाण्डित्यवीरादि अनेकानेक
सम्भावित भेदों की उपेक्षा कर वीर रस के केवल दानवीरादि चार भेद मानना
असंगत है ॥
अद्भुत रस का उदारण निम्नलिखित है—
“हे कृष्ण ? तुम्हारे मुख को, जिसमें यह चराचरात्मक समस्त जगत् समाहित
है और जो आकाश की भी गम्भीरता को अपमानित कर रहा है, देखकर मेरी तो
चेतना हीं लुप्त हो गई है ।”
किसी समय श्रीकृष्ण के पूर्ववर्णित मुख को देखकर यशोदा की यह उक्ति है ।
यहाँ उपरिर्वाणत मुख आलम्बन है । मुख के अन्दर समस्त जगत् का दर्शन उद्दीपन
विभाव है । चेतना की लुप्तता और इससे प्रतीयमान रोमाञ्च और आंखों का
फैलना आदि अनुभाव हैं । गम्यमान त्रास आदि व्यभिचारिभाव हैं । अतः इन
सबसे अभिव्यज्यमान विस्मय का रसपर्यन्त परिपाक होने से यह अद्भुत रस का
उपयुक्त उदाहरण है । यद्यपि यशोदा की अपने पोष्य पुत्र श्रीकृष्ण में मातृसुलभ
प्रीति है अवश्य तथापि वह यहाँ व्यङ्ग्य नहीं है, क्योंकि उदाहृत पद्य में उसका