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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 189

प्रथमाननम् १५७
ननु 'अपि वक्ति—' 'परिहरतु धराम्—' इति पद्यद्वये गर्व एव नोत्साहः,
मध्यस्थपद्ये तु धृतिरेवच्छन्यते इति भावध्वनय एवैते न रसध्वनय इति चेत् ?
तर्हि युद्धवीरादिष्वपि गर्वादिध्वनितामेव किं न ब्रूयाः ? रसध्वनिसामान्यमेव
वा किं न तद्व्यभिचारिध्वननेन गतार्थयेः ? स्थायिप्रतीतिर्दुर्पह्नवा चेत् ?
प्रकृतेऽपि । अनन्तरोक्तपद्ये तु नोत्साहः प्रतीयते, दयावीरादिषु प्रतीयत
इति तु राज्ञामा(राजा)ज्ञामात्रम् ।


गर्व इति । पूर्वपद्ये स्वविद्याप्रकर्षज्ञानाधीनं परावहेलनम्, द्वितीये पुनः स्वबलो-
त्कर्षज्ञानाधीनं तदिति विवेकः । उत्साहो वीररसस्थायिरूपेण व्याख्यातपूर्वः । मध्यस्थं
पद्यम् 'अपि बहलदहनजालम्' इत्यादि । धृतिः = शोकभयादिजन्योपप्लवनिवारणक।-
रणीभूतश्चित्तवृत्तिविशेषो धैर्यादिशब्दाभिधेयः । रसध्वनिसामान्यम् = रसध्वनिमात्रम्,
सर्वं रसध्वनिमिति भावः । तद्व्यभिचारिध्वननेन = तत्तद्रसव्यभिचारिणां तत्र तत्र
रसध्वनिस्थाने ध्वननमिति सर्वत्रैव भावध्वनिस्वीकारेण । अनन्तरोक्तपद्ये = पाण्डित्य-
वीराद्युदाहरणत्वेनोपन्यस्ते पद्यसमूहे । उत्साहः पाण्डित्यक्षमाबलोपाधिकः स
क्रमेण । आज्ञामात्रमित्यनेन न युक्तिसिद्धमिति प्रदर्शितम् । तथा च सम्भवत्सु
चतुर्भ्योधिकेष्वपि वीरभेदेषु चतुर्णामेवाङ्गीकारः प्राचामालङ्कारिकाणां प्रौढिवादमात्र-
मित्याशयः सन्दर्भस्य ।


यादृच्छिक है, प्रामाणिक नहीं ।
अब प्रश्न यह है—'अपि वक्ति......' इत्यादि पद्य में पाण्डित्य का दर्प और
'परिहरतु धराम्........' इत्यादि पद्य में बल का दर्प हीं अभिव्यज्यमान है,
पाण्डित्योत्साह और बलोत्साह नहीं; एवमेव 'अपि बहलदहनजालम्' इस मध्यगत
पद्य में भी केवल धृति का अभिव्यञ्जन होता, क्षमोत्साह का नहीं; एवञ्च इन्हें क्रमशः
पाण्डित्यवीर, बलवीर ओर क्षमावीर के उदाहरण मानकर इनके आधार पर वीर
रस के पूर्वोक्त चातुर्विध्य का निराकरण कैसे किया जा सकता ? इसका उत्तर यह
है—यदि पाण्डित्योत्साह आदि के स्थान में पाण्डित्यदर्प आदि भावों की हीं
व्यञ्जना मान्य हो तब तो युद्धवीरादिस्थलों में भी युद्धदर्पादि की हीं प्रतीति मानिये,
युद्धोत्साह आदि की नहीं; एवञ्च युद्धोत्साहादि की व्यञ्जना के आधार पर वीररस
का उक्त चातुर्विध्य भी असंगत हो जाएगा । इस प्रकार सभी रसध्वनियों के स्थलों
में उन उन भावों की हीं अभिव्यञ्जना स्वीकार कर सभी रसध्वनियों का हीं उच्छेद
प्राप्त हो जाता । अतः यदि युद्धवीरादि-स्थलोंमें युद्धोत्साहादि की मुख्यतया व्यञ्जना
इष्ट हो तो पाण्डित्यवीरादि की भी ध्वनि अवश्य मन्तव्य है । युद्धवीरादि इसलिए
मान्य हैं कि इनके पूर्वनिर्दिष्ट उदाहरणों में युद्धोत्साहादि स्थायिभावों की प्रतीति