रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 188, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंHere is the line-by-line transcription of the text from the image in pure Devanagari script:
१५६ रसगङ्गाधरः
यथा-
अपि बहलदहनजालं मूर्ध्नि रिपुर्मे निरन्तरं धमतु ।
पातयतु वाऽसिधारामहमणुमात्र न किंचिदाभाषे ॥
क्षमावत उक्तिरियम् । बलवीरे वा किं समादध्याः ?
यथा-
परिहरतु धरां फणिप्रवीरः सुखमयतां कमठोऽपि तां विहाय ।
अहमिह पुरुहूत पक्षकोणे निखिलमिदं जगदक्लमं वहामि ॥
पुरुहूतं प्रत्येषा गरुत्मत उक्तिः ।
बहलदहनजालम् = प्रचुरमग्निपुञ्जम् । धमतु = प्रज्वालयतु वायुसंयोगेन ।
फणिप्रवीरः = शेषनागः । अयताम् = प्राप्नोतु । जगदक्लममित्यत्र जगदण्डक-
मिति पाठो मर्मप्रकाशोक्तो न कमपि विच्छित्यतिशयं प्रकाशयति ।
युद्धवीर हीं है-ऐसा यदि कहा जाय तो भी क्षमावीर का अन्तर्भाव कहाँ कर
सकते ? जैसे-
"मेरा शत्रु चाहे मेरे शिर पर लहलहाती आग की भट्टी जलाये या तलवार
बरसाये, मैं तो उसके विरोध में कुछ बोलता तक नहीं, प्रतीकार करने की तो बात
हीं नहीं उठती ॥"
यह किसी क्षमाशील पुरुष की उक्ति है। यहां मूलवक्ता क्षमाशील पुरुष
के प्रति अपराध करने वाला व्यक्ति आलम्बन है। 'क्षमासारा हि साधवः'
इत्यादि क्षमाप्रशंसक शास्त्रवचन उद्दीपन विभाव हैं। शिर पर आग की भट्टी
जलाने आदि को स्वीकार कर लेना अनुभाव है। धृति आदि व्यभिचारिभाव हैं।
इन सबसे क्षमावीर का अभिव्यञ्जन होता हीं है।
इसी तरह बलवीर का समावेश उपर्युक्त चार भेदों में कहाँ किया जाय ?
बलवीर का यह उदाहरण है-
"हे इन्द्र ? शेषनाग इस पृथिवी को धारण करना छोड़ दे, कूर्मावतार भगवान्
भी इसे छोड़कर आनन्द करें। इस सम्पूर्ण जगत् को तो मैं अपने पंख के एक कोने
में ही धारण कर सकता हूँ ॥"
यह इन्द्र के प्रति गरुड़ की उक्ति है। इसमें शेषनाग आदि आलम्बन हैं। उनकी
प्रशंसा का श्रवण उद्दीपन हैं। पृथिवी के धारण के लिए किये गये इच्छादि अनुभाव
हैं। गर्व आदि व्यभिचारिभाव हैं। इन सबसे बलवीर रस की व्यञ्जना होती है।
इस प्रकार स्पष्ट है कि वीररस को पूर्वोक्त चार भेदों में हीं विभक्त करना केवल