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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 187

प्रथमाननम् १५५
सत्यात्' इति चरमपादव्यत्यासेन पद्यान्तरतां प्रापिते सत्यवीरस्यापि
संभवात् । न च सत्यस्यापि धर्मान्तर्गततया धर्मवीररस एव तद्वीरस्या-
प्यन्तर्भाव इति वाच्यम्, दानदययोरपि तदन्तर्गततया तद्वीरयोरपि
धर्मवीरात्पृथग्गणनानौचित्यात् ।
एवं पाण्डित्यवीरोऽपि प्रतीयते ।
यथा—
अपि वक्ति गिरां पतिः स्वयं यदि तासामधिदेवतापि वा ।
अयमस्मि पुरो हयाननस्मरणोल्लङ्घितवाङ्मयाम्बुधिः ॥
अत्र बृहस्पत्याद्यालम्बनः सभादिदर्शनोद्दीपितो निखिलविद्वत्तिर-
स्कारानुभावितो गर्वेण संचारिणा पोषित उत्साहो वक्तुः प्रतीयते । ननु
चात्र युद्धवीरत्वम्, युद्धत्वस्य वादसाधारणस्य वाच्यत्वाद्, इति चेत् ?
क्षमावीरे किं ब्रूयाः ?
वादसाधारणस्येति । प्रत्यवस्थानं युद्धम् । तच्च वादेऽपि वादिप्रतिवादि-
कथात्मके तुल्यमित्याशयः ।
क्षमेति । प्रतीकारेच्छायां जातायामपि विवेकात् प्रतीकाराकरणं क्षमा
मतिनं मनागपैति सत्यात्' इस रूप में परिवर्तित कर दिया जाय तो यही पद्य
सत्यवीर रस का उदाहरण बन सकता है। धर्माङ्गभूत सत्य के धर्मान्तर्गत होने से
सत्यवीर का धर्मवीर में अन्तर्भाव हो जाने के कारण धर्मवीर से अतिरिक्त सत्यवीर
मानने की कोई आवश्यकता नहीं—यह कहना भी अयुक्त है, क्योंकि तब तो दान
और दया के भी धर्मान्तर्गत होने से दानवीर तथा दयावीर को भी एक-एक भेद
मानना अनुचित हो जाएगा। अतः दानवीर आदि यदि धर्मवीर से भिन्न माने जायँ
तो सत्यवीर को भी उससे भिन्न हीं मानना चाहिए।
इसी प्रकार पाण्डित्यवीर की भी निम्ननिर्दिष्ट पद्य में प्रतीति होती । जैसे—
“लौकिक विद्वानों की तो कोई बात हीं नहीं, यदि बृहस्पति या साक्षात्
वाग्देवता सरस्वती भी मेरे विपरीत पक्ष का आलम्बन करें तो भी मेरे लिए अपने
पक्ष के समर्थन में कोई अन्तर नहीं पड़ने वाला है, क्योंकि भगवान् हयग्रीव के
स्मरण के प्रभाव से मैं सम्पूर्ण वाङ्मय-रूपी समुद्र को पार कर चुका हूँ।।”
यहाँ बृहस्पति आदि आलम्बन विभाव हैं। पण्डितों के वादार्थ आयोजित सभा
तथा उसमें किये गये काकु आदि उद्दीपन विभाव हैं। सभी विद्वानों का तिरस्कार
अनुभाव है और व्यज्यमान गर्व व्यभिचारिभाव है। इन सब से परिपुष्ट वक्ता का
पाण्डित्योत्साह पाण्डित्यवीर की अवस्था को प्राप्त है। घात-प्रतिघातस्वरूप युद्ध में
वाचिक-घात-प्रतिघातात्मक वाद (कथा) के भी समाविष्ट होने से यह