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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 414 में से

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पृष्ठ 186

१५४ रसगङ्गाधरः
चतुर्थो यथा--
सपदि विलयमेतु राज्यलक्ष्मीरुपरि पतन्त्वथवा कृपाणधाराः ।
अपहरतुतरां शिरः कृतान्तो मम तु मतिर्न मनागपैति धर्मात् ॥
एषाऽधर्मेणापि रिपुर्जेतव्य इति वदन्तं प्रति युधिष्ठिरस्योक्तिः । अत्र
धर्मविषय आलम्बम् । 'न जातु कामान्न भयान्न लोभाद्धर्मं त्यजेज्जीवित-
स्यापि हेतोः' इत्यादिवाक्यालोचनमुद्दीपनम् । शिरश्छेदाद्यङ्गीकारो-
ऽनुभावः । धृतिः संचारिणी ।
इत्थं वीररसस्य चातुर्विध्यं प्रपञ्चितं प्राचामनुरोधात् । वस्तुतस्तु
बहवो वीररसस्य शृङ्गारस्येव प्रकारा निरूपयितुं शक्यन्ते । तथा हि—
प्राचीन एव 'सपदि विलयमेतु' इत्यादिपद्ये 'मम तु मतिर्न मनागपैति
रसप्रत्ययोपकारकत्वमेवेत्येतेन प्रकटम् ।
धर्मवीरमुदाहरति — चतुर्थ इत्यादिना । सपदीत्यादि पद्यार्थः स्फुटः ।
धर्मविषयः शत्रुः, यमुद्दिश्य धर्माचरणं प्रतिज्ञातम् । 'धर्मस्य विषयः सम्बन्ध्य-
नुष्ठानम्, धर्म एव वाऽनुष्ठानोद्देश्यतया विषयः' इति त्वपव्याख्यानम् । प्राचीने =
पूर्वोदाहृते । तदन्तर्गततया = धर्मान्तर्गततया । अत्रार्थे मन्वादिवचनं प्रमाणम् ।
तासां वाचामधिदेवता सरस्वतीत्यर्थः ।
अब 'धर्मवीर' का उदाहरण प्रस्तुत है—
“चाहे मेरी राज्यलक्ष्मी तत्काल हीं विनष्ट हो जाये या मेरे ऊपर तलवारों की
मार पड़े या मेरा शिर (प्राण) यमराज हर ले पर मैं धर्मपथ से जरा भी नहीं
हँट सकता ॥”
'अधर्मपथ पर चल कर भी शत्रु को जीतना चाहिए'—ऐसा कहने वाले व्यक्ति
के प्रति युधिष्ठिर की यह उक्ति है । यहाँ वह शत्रु आलम्बन है जिसके साथ
युधिष्ठिर ने धर्मपथावलम्बन की प्रतिज्ञा की है । 'काम की पूर्ति, भय या लोभ
से, यहाँ तक कि अपने प्राण बचाने के लिए भी धर्म का परित्याग नहीं करना
चाहिए' इत्यादि महाभारतादिप्रोक्त अनुशासनों का स्मरण उद्दीपन विभाव है ।
धर्मानुष्ठान के लिए अपने शिरश्छेदन आदि का स्वीकार अनुभाव है । धृति
सञ्चारिभाव है । अतः इन विभावादि से यहाँ धर्मवीर की व्यञ्जना होती है ॥
इस प्रकार वीर रस के उक्त चार भेदों का निरूपण प्राचीनमतानुसार किया
गया है । किन्तु वास्तविकता यह है कि जैसे शृङ्गार के अनेकानेक भेद हो सकते
उसी तरह वीर रस के भी बहुत भेद सम्भव हैं; केवल पूर्वोक्त चार हीं भेद नहीं ।
उदाहरणार्थ, 'सपदि विलयमेतु .........' इत्यादि पद्य का चतुर्थ पाद यदि 'मम तु