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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 185

प्रथमाननम् १५३
एषा दशवदनं प्रति भगवतो रामस्योक्तिः । इह भव आलम्बनम् ।
रणदर्शनमुद्दीपनम् । दशवदनावज्ञाऽनुभावः । गर्वः संचारी । वृत्तिरत्र देवानां
प्रस्तावे तद्गतकातर्यप्रकाशनद्वारा वीररसानालम्बनत्वावगतयेऽनुद्धतैव ।
दशवदनप्रस्तावे तु देवदर्पदमनवीरत्वप्रतिपादनायोद्धतापि तस्यावज्ञया
रामगतोत्साहानालम्बनत्वेन तदालम्बनस्य रसस्याप्रत्ययान्न प्रकर्षवती ।
भगवतो भवस्य तु परमोत्तमालम्बनविभावत्वात्तत्प्रस्तावे तदालम्बनस्यौ-
जस्विनो वीररसस्य निष्पत्तेः प्रकृष्टोद्धता ।
अत्र देवानां दीनत्वविशेषणं तद्विद्रावणे रावणे क्षुद्रत्वं प्रतिपादयद्रामकर्तृकां
तदवज्ञां द्योतयति । अस्मदर्थस्य च प्रसङ्गादेव प्रतीतेरन्यथा तत्प्रयोगादपि तत्प्रती-
त्यभावादुभयत्रास्मच्छब्दोऽर्थान्तरसंक्रमितवाच्यध्वनिना शौर्यप्रकर्षविशिष्टं रामं
प्रतिपादयति, तेन च गर्वो व्यज्यते । पद्येऽत्र भव - शब्दप्रयोगौचित्यं चिन्त्यम् ।
अत्र देवरावणोभयालम्बनकस्य युद्धवीरस्य यथा प्रतीत्यभावस्तदुपपादयति—
वृत्तिरत्रेत्यादिना । प्रस्तावे = वर्णने । प्रकर्षवतीति । प्रकर्षश्चात्र वृत्ते
युद्धभूमि में रावण के प्रति भगवान् राम की यह उक्ति है । इसमें भगवान्
शङ्कर आलम्बन हैं । युद्धदर्शन उद्दीपन विभाव है । दशमुख रावण का तिरस्कार
अनुभाव है । व्यज्यमान रामनिष्ठ गर्व व्यभिचारिभाव है । यहाँ वृत्तियाँ
( वर्णरचना ) भी अर्थानुरूप शिथिल अथवा उद्धत ( प्रौढ़ ) हैं । जैसे—देवताओं
के प्रसङ्ग में ( रणे दीनान् देवान् ) देवों की कायरता के प्रतिपादन में अनुकूल
शिथिला ( कोमला ) वृत्ति है जिससे यह स्पष्ट हो जाता कि कायर देवता
वीररस के आलम्बन नहीं हैं । दशमुख के वर्णन (विद्राव्य············प्रागल्भ्यम्)
में उद्धता वृत्ति अवश्य है जिससे देवता के दर्प को चूर-चूर करने वाले रावण की
वीरता प्रकट होती; किन्तु 'त्वयि तु······' इत्यादि कथन से रावण की उपेक्षा प्रकट
हो जाने से रावण भी रामनिष्ठ युद्धोत्साह का आलम्बन नहीं हो सकता । अतः
रावणालम्बनक वीररस की भी प्रतीति नहीं होती । अत एव इस अंश में वृत्ति
उद्धता तो है परन्तु प्रकृष्टोद्धता नहीं है । यह विवक्षितार्थ के अनुरूप ही है ।
रामनिष्ठ उत्साह के भगवान् भव हीं परम उपयुक्त आलम्बन हैं । अतः उस प्रसङ्ग
में 'ललाटोद्यज्ज्याला·········' आदि में शङ्करालम्बनक वीररस की प्रतीति होने से
प्रकृष्टोद्धता वृत्ति है¹ । 'भव' के स्थान में 'हर' शब्द का प्रयोग उचित है ।
१. यद्यपि वृत्तियों में रसव्यञ्जकता साक्षात् नहीं होती तथापि तत्तद्रसोपयोगी
गुणों के अभिव्यञ्जक होने से वृत्तियों को भी रसाभिव्यञ्जन में सहकारी
माना जाता है ।