सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 178, कुल 414 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 178

१४६ रसगङ्गाधरः
अत्रे न्द्रसभामध्यगतसकलनिरीक्षकालम्बनः अवनिमण्डलागतवियद्-
बन्दीन्द्रवदनविनिर्गतराजदानवर्णनोद्दीपितः, ऊधःप्रस्तुतपीयूषप्रकरैरनु-
भावितः, असूयादिभिः संचारिभिः परिपोषितोऽपि कामगवीगत उत्साहो
राजस्तुतिगुणीभूत इति न रसव्यपदेशहेतुः ।
अत एवैदमपि नोदाहरणम्—
साब्धिद्वीपकुलाचलां वसुमतीमाक्रम्य सप्तान्तरां
सर्वां द्यामपि सस्मितेन हरिणा मन्दं समालोकितः ।
परगुणासहिष्णुतया निर्भरमतिमात्रं फुल्लोऽत्थितो रोम्णां यो निकरस्तस्माद्
व्यावल्गद्ऋत्फुल्लसंकुचिताग्रभागं यदूधः स्तनस्तस्मात् स्रवद्भिः पीयूषाणां प्रकरैः प्रवाहैः
सुरेन्द्रसुरभिः कामधेनुः प्रावृषः पयोद इवाचरति निरन्तरं प्रवहतीत्यर्थः ।
अत्र विभावादिभिः परिपोषितोऽप्युत्साहो राजस्तुतिगुणीभूतत्वान्न रसपदभागि-
त्युपपादयति—अत्रेत्यादिना । एवंविधे स्थल एव रसवदलङ्कारत्वं प्राचामिष्टम् ।
असूयेति। गुणेषु दोषत्वबुद्धिरसूयाऽक्षमारूपा चेर्ष्येति सा भिन्नेवासूयाजन्येति बोध्यम् ।
एतच्च मर्मप्रकाशानुसारेण । वस्तुत एतादृशेर्ष्याऽसूययोर्जन्यजनकभावे विपर्यासो
मर्मप्रकाशकृतः । पण्डितराजेन वक्ष्यमाणाया असूयायास्तु मर्मप्रकाशोक्तेर्ष्याया भेदो न
स्पष्टः । एवञ्चात्रादृष्टकारणभेदकृतो भेदो द्रष्टव्य ईर्ष्यासूययोः । यद्वान्योत्कर्ष-
दर्शनादिजन्यः स्वापकर्षबुद्धिविशेषः तादृशबुद्धिजन्य आक्रोशो वेर्ष्येति मन्तव्यम् ।
अमर्ष एव वा सा ।
साब्धिद्वीपेत्यादि । पदत्रयपरिमितां भूमि वामनाय प्रतिश्रुतवतो दैत्यराजस्य
में जो गुदगुदी लग गई है उसके कारण यह ( कामधेनु ) वर्षाकालिक बादल के
समान दूध की धारा बहा रही है ॥”
यहां इन्द्र की सभा में स्थित सभी सज्जन (देववृन्द) जिनके लिए कामधेनु दूध
की धारा बहा रही है, कामधेनुगत दुग्धदानोत्साह के आलम्बन हैं। भूमण्डल से
लौटकर आये स्वर्गीय प्रतिष्ठित बन्दी-गण के मुख से राजा के अधिकाधिक दान-
प्रवाह का श्रवण उद्दीपन विभाव है। स्तनों से बहने वाली दूध की धारा
अनुभाव है और असूया आदि सञ्चारिभाव हैं । इस प्रकार विभावादि से कामधेनु-
गत उत्साह का अभिव्यञ्जन तो यहाँ होता हीं है किन्तु इसे रसध्वनि नहीं कहा
जा सकता, क्योंकि इस पद्य में राजा की स्तुति के हीं प्रधान रूप में वक्ता
का तात्पर्य्य-विषय होने से उक्त उत्साह प्रधान नहीं है अपि तु वह राज-स्तुति का
अङ्ग है ॥
इसी अङ्गत्व के कारण निम्ननिर्दिश्यमान पद्य में भी बलि का प्रतीयमान
दानोत्साह दानवीरध्वनि का उदाहरण नहीं हो सकता—