रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०८ रसगङ्गाधरः
(५) 'मुख्यतया दुष्यन्तादिगत एव रसो रत्यादिः कमनीयविभावाद्य-
भिनयप्रदर्शनकोविदे दुष्यन्ताद्यनुकर्तरि नटे समारोप्य साक्षात्क्रियते'
लोल्लटाद्यनुसारेणाह—मुख्यतयेत्यादि । रसो रत्यादिरितिवचनेनास्मिन् मते
स्थायिभाव एव रसो न तु बोधात्मकः पूर्वमतवदिति स्पष्टम् । कमनीयेत्यादि ।
कमनीयो यो विभावादीनामभिनयस्तत्प्रदर्शने कोविदो निपुणस्तस्मिन् । अभिनय-
प्रदर्शनकोविदत्वेनेदं बोध्यते यन्नटकर्तृकाभिनयस्य कृत्रिमत्वेऽप्यकृत्रिमवत्
प्रतीतिः सामाजिकानामिति नटे दुष्यन्तत्वारोपः सुकर इति । दुष्यन्तोऽयं शकुन्तला-
विषयकरतिमानिति प्रत्यक्षाकारप्रदर्शनेन चेदमपि स्पष्टमेव यत्प्रथमं नटे दुष्यन्त-
त्वारोपस्तदनन्तरं च तस्मिन् शकुन्तलाविषयकरत्यारोपः । एतच्च ज्ञानं
सामाजिकानां जायमानं साक्षात्कारात्मकम्, तच्चेदम्पदार्थोपस्थितस्य चक्षुषा
संयोगात्तदंशे लौकिकम्, आरोप्यस्य च रतेस्तद्गतौ दुष्यन्तत्वस्य च चक्षुषा सह संयुक्त-
समवायो न सम्भवति, तयोरारोप्ययोस्तत्राऽसत्त्वात् । अत आरोप्येण सह चक्षुषो
ज्ञानलक्षणात्मकोऽलौकिक एक एव सन्निकर्ष इत्युभाभ्यामपि सन्निकर्षाभ्यामेकमेव
पूर्वोक्तवत्साक्षात्कारात्मकं भ्रमज्ञानं जायते । यच्च रत्यादिज्ञानं सन्निकर्षस्थानीयं
विषयकरतिमान्", (२) "शकुन्तलाविषयकरतिमान् दुष्यन्तोऽहम्" और (३) "अहं
दुष्यन्तः शकुन्तलाविषयकरतिमांश्च ।" प्रथम बोध में अहम्पदार्थ धर्मी, दुष्यन्तत्व
धर्मितावच्छेदक है। अतः दुष्यन्तत्वविशिष्ट अहम्पदार्थ में रतिका वैशिष्ट्य-सम्बन्ध
विषय होता। अतः इसमें पहले दुष्यन्तत्व का और उसके बाद रति का सम्बन्ध
प्रकट होता। द्वितीय बोध में रति दुष्यन्त का विशेषण है और रतिविशिष्ट
दुष्यन्त अहम्पदार्थ का विशेषण है। इसमें विशेषण (दुष्यन्त) का विशेषण होने
से रति को विशेषणतावच्छेदक कहा जाना चाहिए। तृतीय बोध में रति तथा
दुष्यन्त दोनों हीं अहम्पदार्थ के विशेषण हैं। इस मत में रति का बोध दुष्यन्तादिनिष्ठ
तत्त्व के रूप में अनुमान प्रमाण द्वारा पहले होता और बाद में भावना के आधार
पर दुष्यन्त से अपना भेद न समझने के कारण सामाजिक को ज्ञानलक्षणसन्निकर्ष
से उसका अलौकिक प्रत्यक्ष होता। इस अनुमान में हेतुभूत है दृश्य काव्य में
दुष्यन्तस्थानीय नट में दुष्यन्तचेष्टासदृश चेष्टा (का ज्ञान) और श्रव्य (या पाठ्य)
काव्य में शब्द से होने वाले दुष्यन्त की चेष्टा का ज्ञान ॥
अब ग्रन्थकार भरतसूत्र के एक व्याख्याकार लोल्लट के मत को प्रस्तुत कर
रहे हैं—रसस्वरूप रत्यादि वास्तविक रूप में तो दुष्यन्तादि में हीं रहते। किन्तु
विभाव आदि के रोचक (अत्यन्त स्वाभाविक) अभिनय के प्रदर्शन में निपुण नटों
में पहले दुष्यन्तादि के सादृश्यातिशय के कारण दुष्यन्तत्व आदि का आरोप सहृदय