सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 414 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 139

प्रथमाननम् १०५
शिष्टचावगाही, वा त्रिविधोऽपि बोधो रसपदार्थतयाभ्युपेयः। तत्र रते-
विशेषणीभूतायाः शब्दादप्रतीतत्वाद्व्यञ्जनायाश्च तत्प्रत्यायिकाया अनभ्यु-
पगमाच्चेष्टादिलिङ्गकमादौ विशेषणज्ञानार्थमनुमानमभ्युपेयम् ॥
बोधः सामाजिकस्येत्युपपादयति — रतेरित्यादिना । अत्र च मते नटेऽपि
शङ्कुकमतवच्चित्रतुरगादिन्यायेन दुष्यन्ताद्यभेदबुद्धिः स्वीकर्त्तव्या, तदभावे नटचेष्टा-
दिभिर्दुष्यन्तनिष्ठरतेरनुमित्यसम्भवादिति ध्येयम् । यद्वा सादृश्यादिना नटचेष्टादौ
दुष्यन्तादिचेष्टादितादात्म्यारोपाद् भेदाग्रहाद्वा नटे दुष्यन्तादितादात्म्यारोपस्तद्-
भेदाग्रहो वा मन्तव्यः । अत्र च पक्षे दुष्यन्तादौ नटसमवेतचेष्टादेरभावादेतच्चेष्टादे-
र्हेत्वाभासत्वेन दुष्यन्तादिनिष्ठरत्यादेरनुमितिरपि यद्यप्याभासरूपैव तथापि तत्र
रत्यादिसत्त्वं न विरुध्यते, बाधातिरिक्तहेत्वाभासानां साध्यसाधकत्वाभावेऽपि
साध्याभावाऽसाधकत्वात् । अथवा रत्यादिवासनावतः सामाजिकस्य नटे रत्यादि-
व्याप्यचेष्टासदृशचेष्टादर्शनाद्दुष्यन्तादिनिष्ठादृशचेष्टानुमितिः, तस्याश्च दुष्यन्तादि-
निष्ठरत्याद्यनुमितिः सुलभवैति व्याख्येयम् ॥
अविद्यमान रजत के बीच सन्निकर्ष का कार्य करता । यद्यपि इस ज्ञान में इदम्पदार्थ
के साथ चक्षु का संयोग और अविद्यमान किन्तु स्मर्यमाण रजत के साथ ज्ञानलक्षण-
सन्निकर्ष होता तथापि 'इदं रजतम्' इत्याकारक ज्ञान एक हीं होता, दो नहीं, क्योंकि
अनेक सन्निकर्षों से एक ज्ञान की उत्पत्ति विषयान्तर में भी प्रसिद्ध है। इसी से
यह भी स्पष्ट है कि इस मत में जिस रत्यादिबोध को रस कहा गया है उस बोध में
धर्मी अहम्पदार्थ का तो लौकिक सन्निकर्ष-संयोग से मन द्वारा प्रत्यक्ष होता जब कि
धर्म—विशेषणीभूत रत्यादिका ज्ञानलक्षणसन्निकर्षजन्य अलौकिक प्रत्यक्ष हीं होता ।
परन्तु उभयसन्निकर्षजन्य यह मानस साक्षात्कार एक है, अनेक नहीं—यह पहले हीं
कहा जा चुका है । साथ हीं, यह बोध भ्रमात्मक है, क्योंकि जिस रत्यादि का
स्वनिष्ठ रूप में बोध होता वह वस्तुतः सामाजिक में रहता नहीं । ज्ञानलक्षण-
सन्निकर्षजन्य बोध भी यथार्थ हो सकता है यदि उसका विषय जहां ज्ञात हो रहा
है वहां सत् हो । इसका प्रसिद्ध उदाहरण है 'सुरभि चन्दनम्' यह प्रत्यक्ष । इस
मत में आस्वादात्मक बोध के ही 'रस' होने से रस तथा आस्वाद दोनों एक वस्तु.
के ही दो नाम हैं, रस विषय हो और आस्वाद रसविषयक बोध हो—ऐसा नहीं ।
अतः 'रस का आस्वाद होता है' यह प्रसिद्धि औपचारिक है, वास्तविक नहीं । जिस
रत्यादि के बोध को रस कहा जाता वह रत्यादि हीं औपचारिक रूप में 'रस'
कहलाता जिसको विषय बनाते वाला है, आस्वादात्मक बोध (= रस) ।
उक्त रसात्मक बोध के तीन रूप हो सकते हैं—(१) "दुष्यन्तोऽहं शकुन्तला-