रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् १०५
रत्यादिमदभेदबोधो मानसः काव्यार्थभावनाजन्मा विलक्षणविषयताशाली
रसः। स्वप्नादिस्तु तादृशबोधो न काव्यार्थचिन्तनजन्मेति न रसः। तेन
तत्र न तादृशाह्लादापत्तिः। एवमपि स्वस्मिन्नविद्यमानस्य रत्यादेरनुभवः
कथं नाम स्यात् ? मैवम् । न ह्ययं लौकिकसाक्षात्कारो रत्यादेः, येनावश्यं
अनिर्वचनीयख्यातेः = सामाजिकाऽनिर्वचनीयरत्यादिप्रतीतेस्तत्समकालिकतदुत्पत्तेश्च ।
प्रागुक्तदोषोऽत्र रत्यादिभावनात्मकः । मानस इति आत्माश्रयत्वाद्रत्यादिबोध-
स्योक्तम् । काव्यार्थभावनेति । काव्यस्य वाच्यो लक्ष्यो वा योऽर्थस्तस्यानुसन्धानम् ।
इयं च भावना प्रागुक्तदोषात्मकभावनाया अनुमितरत्यादिविषयिकाया अभिन्नेवेति
बोध्यम् । इयमेव ज्ञानलक्षणसन्निकर्षः। विलक्षणेति । विषयतायां वैलक्षण्यं
चात्राऽसद्विषयाश्रितत्वमेव बोध्यम् । भ्रम इति । तथा च विषयसद्भावाऽभावेऽपि
यथा शुक्तिरजतस्य चाकचिक्यदर्शनसमुद्बोधितरजतविषयकसंस्कारजन्यस्मरणात्मक-
ज्ञानलक्षणजन्यो भ्रमात्मकः साक्षात्कारोऽलौकिको नैयायिकादिभिः स्वीक्रियते तथैव
प्रकृतेऽपीति भावः। धर्म्यंशे त्वयमपि बोधः साक्षात्कारात्मकौ लौकिक एवेति
बोध्यम् । अत्र च मते बोधस्यैवास्वादरूपस्य रसत्वाभ्युपगमाद् 'रसस्यास्वादः' इति
दुष्यन्तादिस्थानीय नट की दुष्यन्तादिचेष्टासदृश चेष्टा आदि को देखकर दुष्यन्तादि
की रत्यादिव्याप्य चेष्टा आदि की अनुमिति और उस अनुमित चेष्टादि से
दुष्यन्तादिनिष्ठ रत्यादि की अनुमिति हो जाती है। उसके बाद जब सामाजिक
उस रत्यादि की भावना करता तब इसी भावनास्वरूप दोष के प्रभाव से सामाजिक
को दुष्यन्तादि के साथ अपने तादात्म्य का भ्रम होता और वह अपने को शकुन्तला-
दिविषयक रत्यादि से युक्त समझने लग जाता । यह समझना मानस बोध है, क्योंकि
रत्यादि का आत्मनिष्ठ पदार्थ के रूप में बोध मनोजन्य हीं हो सकता है । इस बोध
के विषय अपने में वस्तुतः अविद्यमान रत्यादि में जो विषयता होती वह सद्विषय-
निष्ठ विषयता से विलक्षण हीं होती । अविद्यमान रत्यादि जो सामाजिक के बोध
का विषय होता वह काव्यार्थ के पुनः पुनः अनुसन्धान (= भावना) के कारण ।
(यही अनुसन्धान ज्ञानलक्षणसन्निकर्ष का कार्य करता जिससे सामाजिक को
आत्मनिष्ठ रूप में रत्यादि का अलौकिक प्रत्यक्ष होता । ) उक्त रत्यादिबोध हीं
'रस' है। स्वप्न आदि में भी यद्यपि 'अहं दुष्यन्तः शकुन्तलाविषयकरतिमान्'
इत्याकारक बोध हो सकता है तथापि उसे 'रस' नहीं कहा जा सकता, क्योंकि
वह काव्यार्थभावना से उत्पन्न नहीं होता, अर्थात् उस बोध में विशेषणीभूत रत्यादि
का ज्ञानलक्षणसन्निकर्षजन्य अलौकिक साक्षात्कार नहीं होता । अतः स्वाप्नादि-
बोध को 'रस' कहना सम्भव नहीं । इसलिए स्वाप्नादि-बोध में लोकोत्तर आह्ला-