रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें" "गुप्त" -> there is a space! "नव गुप्त आदि के मत में".
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Wait, let's check line 20: "चित् हीं रस है।" vs "चित् हीं रस है ।"
There is a space before danda: "चित् हीं रस है ।"
Wait, look at "है।" in line 20:
"उपहित भग्नावरणा चित् हीं रस है । यह रस नित्य और स्वयम्प्रकाश है । अभि-" -
Let's check line 31: "आस्वाद्ययोग्य नहीं होता ।"
"आस्वाद्य" and "योग्य": the shirorekha is continuous: "आस्वाद्ययोग्य"! -
Double-check all punctuation, spaces, dandas, hyphens. Everything looks solid and faithful.८० रसगङ्गाधरः
नित्यत्वं स्वप्रकाशत्वं च सिद्धम् । रत्याद्यंशमादाय त्वनित्यत्वमितरभास्यत्वं
च । चर्वणा चास्य चिद्गतावरणभङ्ग एव प्रागुक्ता, तदाकारान्तःकरण-
वृत्तिर्वा । इयं च परब्रह्मास्वादात्समाधेर्विलक्षणा, विभावादिविषयसंवलित-
चिदानन्दालम्बनत्वात् । भाव्या च काव्यव्यापारमात्रा